क्या वाइब्रेंट विलेज योजना बदल सकती है उत्तराखंड के सीमांत गांवों की किस्मत?

उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई वाइब्रेंट विलेज योजना अब केवल आधारभूत सुविधाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यटन विकास और पलायन रोकने का भी प्रभावी माध्यम बन सकती है। यह विचार वरिष्ठ चिंतक डॉ. रवि शरण दीक्षित ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े गांवों को देश के “प्रथम गांव” के रूप में विकसित करने की सोच अत्यंत दूरदर्शी है। योजना के अंतर्गत पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों के सीमांत गांवों को शामिल किया गया है। इन क्षेत्रों का विकास न केवल स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाएगा, बल्कि सीमा सुरक्षा को भी मजबूती प्रदान करेगा।

डॉ. दीक्षित ने कहा कि चारधाम यात्रा के दौरान उत्तराखंड में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। यदि वाइब्रेंट विलेज के तहत चयनित गांवों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो ये क्षेत्र स्थायी पर्यटन केंद्र बन सकते हैं। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन की समस्या पर भी प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।

उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में लगभग 1700 गांव जनविहीन हो चुके हैं, जबकि 500 से अधिक गांव ऐसे हैं जहां जनसंख्या लगातार घट रही है। चीन और नेपाल सीमा से लगे 26 गांव भी पलायन की चुनौती से प्रभावित हैं। ऐसे में वाइब्रेंट विलेज योजना इन क्षेत्रों में जीवन और आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान करती है।

प्रदेश सरकार भी पलायन प्रभावित गांवों को विभिन्न योजनाओं से जोड़ने और प्रवासी उत्तराखंडियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रही है। अब तक देश-विदेश में रहने वाले प्रवासियों ने लगभग 30 गांवों को गोद लिया है।

डॉ. दीक्षित का मानना है कि यदि वाइब्रेंट विलेज योजना को जन आंदोलन और पर्यटन विकास से जोड़ा जाए तो यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।

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