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रुड़की से था बशीर बद्र का खास रिश्ता, जानिए क्यों भूल नहीं पा रहे लोग

रुड़की। उर्दू गजल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध शायर और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। भोपाल में उनके निधन के बाद देश-विदेश में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। उत्तराखंड के रुड़की, मंगलौर, कलियर, हरिद्वार और देहरादून से उनका विशेष लगाव रहा, जिसकी यादें आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।

उत्तराखंड उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष एवं अंतरराष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने बताया कि डॉ. बशीर बद्र का रुड़की से गहरा भावनात्मक संबंध था। मेरठ विश्वविद्यालय में उर्दू विभागाध्यक्ष रहते हुए वह युवा रचनाकारों और विद्यार्थियों को लगातार प्रोत्साहित करते थे। अफजल मंगलौरी भी छात्र जीवन में उनसे प्रभावित रहे और साहित्यिक आयोजनों में उनके संपर्क में आए।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान डॉ. बशीर बद्र का घर जला दिया गया था। इस दर्दनाक घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसी पीड़ा से उनकी कई प्रसिद्ध गजलें जन्मीं, जिनके शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इसके बाद उन्होंने मेरठ छोड़कर भोपाल में बसने का निर्णय लिया।

अफजल मंगलौरी के आमंत्रण पर 26 जून 1988 को डॉ. बशीर बद्र रुड़की पहुंचे। उनके सम्मान में नगर पालिका सभागार में “एक शाम-बशीर बद्र के नाम” कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया। इस अवसर पर उन्हें राष्ट्रीय एकता सम्मान से भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के बाद वह कई दिनों तक रुड़की में रहे और कलियर शरीफ, हरिद्वार तथा मंगलौर में भी विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल हुए।

डॉ. बशीर बद्र का उत्तराखंड से जुड़ाव वर्षों तक बना रहा। उन्होंने कई बार देहरादून, हरिद्वार, मंगलौर और रुड़की में मुशायरों एवं काव्य गोष्ठियों में शिरकत की। उनकी शायरी और सरल व्यक्तित्व ने उन्हें हर वर्ग में लोकप्रिय बनाया।

अफजल मंगलौरी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. बशीर बद्र का साहित्यिक योगदान सदैव याद रखा जाएगा। उनकी गजलें आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी और उर्दू साहित्य में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।

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