Uttarakhand High Court का बडा फैसला, नहीं दे सकते 11% अटेंडेंस वाले Law स्टूडेंट परीक्षा

कड़ा रुख: हाई कोर्ट ने बहुत कम उपस्थिति वाले कानून के छात्र को परीक्षा देने की अनुमति देने से इनकार किया। नियमों के तहत प्रत्येक सेमेस्टर में 70% उपस्थिति अनिवार्य, शैक्षणिक अनुशासन और गुणवत्ता से समझौता स्वीकार नहीं, सहानुभूति पर राहत देने से परिसरों में अराजकता बढ़ेगी…

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शैक्षणिक मर्यादा और विधिक शिक्षा की गुणवत्ता के संवर्धन को लेकर एक अत्यंत कड़ा और दूरगामी निर्णय प्रतिपादित किया है। माननीय न्यायालय ने मात्र 11 प्रतिशत की अत्यंत न्यून उपस्थिति (अटेंडेंस) वाले कानून के एक शिक्षार्थी को सत्र परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान करने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया है। पीठ ने कड़े शब्दों में रेखांकित किया कि शैक्षणिक नियमावली एवं अनुशासन के मानदंडों में इस प्रकार की घोर उदासीनता को किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

प्रकरण के विवरण के अनुसार, अष्टम सेमेस्टर के उक्त छात्र को उसकी अत्यंत कम उपस्थिति के चलते विगत 5 मई से प्रारंभ हुई अंतिम परीक्षाओं में सम्मिलित होने से वंचित कर दिया गया था। इस दंडात्मक कार्रवाई के विरोध में छात्र ने उच्च न्यायालय की शरण लेकर ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (परमादेश) के माध्यम से शेष प्रश्नपत्रों में बैठने की विशेष अनुमति की गुहार लगाई थी।

 सुनवाई के अनुक्रम में भारतीय बार काउंसिल (बीसीआई) ने विधिक शिक्षा नियम, 2008 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत प्रत्येक सत्र की परीक्षा हेतु न्यूनतम 70 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है। विशिष्ट दशाओं में कुलाधिपति अथवा डीन को केवल 65 से 70 प्रतिशत तक की उपस्थिति पर ही शिथिलता प्रदान करने का अधिकार है। चूंकि याचिकाकर्ता की उपस्थिति का ग्राफ महज 11 प्रतिशत था, जो निर्धारित मापदंडों से काफी नीचे है, अतः इसमें किसी भी प्रकार के विवेकाधिकार अथवा विधिक राहत की कोई संभावना शेष नहीं रह जाती।

वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी ने बीसीआई की इन दलीलों को न्यायसंगत माना। उच्च न्यायालय ने विधि महाविद्यालयों में अनुशासन और सुव्यवस्था स्थापित करने में बार काउंसिल की विनियामक भूमिका को सही ठहराया। अदालत ने टिप्पणी की कि बिना पर्याप्त उपस्थिति वाले विद्यार्थियों को केवल सहानुभूति के आधार पर परीक्षा की अनुमति देना शैक्षणिक व्यवस्था के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा, जिससे संस्थानों में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होगी और विधिक शिक्षा के स्तर का अवमूल्यन होगा।

बहरहाल, अदालत ने छात्र के भविष्य को देखते हुए याचिका का निस्तारण करते हुए यह सीमित अवसर अवश्य दिया है कि वह 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष बीसीआई के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, जिस पर काउंसिल को एक सप्ताह की अवधि में नियमानुसार समुचित आदेश पारित करना होगा।

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