महिला आरक्षण पर राजनीति तेज, लेकिन टिकट देने में क्यों पीछे हैं दल?

नई दिल्ली। देश में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने को लेकर सभी राजनीतिक दल बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन चुनावी मैदान में महिलाओं को टिकट देने के मामले में अधिकांश दल पीछे नजर आते हैं। महिला आरक्षण कानून को लेकर फिर से चर्चा तेज होने के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब सभी दल महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की बात करते हैं, तो उन्हें चुनाव में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं दिए जाते।

साल 2023 में संसद ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाला संविधान संशोधन विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया था। इसे महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम माना गया। हालांकि कानून लागू करने में देरी और इसे चुनावी मुद्दा बनाए जाने को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आरक्षण देने से महिलाओं की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी। महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से मजबूत बनाना भी जरूरी है। राजनीति में सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें संगठनात्मक स्तर पर भी अवसर मिलने चाहिए।

हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के आंकड़े राजनीतिक दलों के दावों की पोल खोलते नजर आए। कुल 834 सीटों में महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद कम रही। कई बड़ी पार्टियों ने बहुत सीमित संख्या में महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में प्रमुख दल महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने में पीछे रहे।

विश्लेषकों का कहना है कि अधिकांश दल अभी भी महिलाओं को चुनावी राजनीति में बराबरी का मौका देने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं दिखते। राजनीति में प्रभावशाली परिवारों से जुड़ी महिलाओं को ज्यादा अवसर मिलते हैं, जबकि सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं के लिए आगे बढ़ना अभी भी चुनौती बना हुआ है।

महिला आरक्षण को लेकर बहस के बीच यह मांग भी उठ रही है कि राजनीतिक दल केवल कानून बनाने तक सीमित न रहें, बल्कि संगठन और चुनावी राजनीति में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाएं। तभी राजनीति में लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा

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