लंदन। इंसान की मौत आखिर कैसे होती है—क्या यह केवल दिल की धड़कन रुकने से होती है या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक कारण छिपा है? वैज्ञानिकों के अनुसार, मौत का असली रहस्य शरीर की कोशिकाओं में होने वाली धीमी प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे जैविक बुढ़ापा कहा जाता है।
आम तौर पर जब किसी व्यक्ति की सांसें बंद हो जाती हैं और दिल धड़कना बंद कर देता है, तो इसे क्लिनिकल डेथ कहा जाता है। इसके कुछ मिनट बाद दिमाग को ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण वह भी काम करना बंद कर देता है, जिसे ब्रेन डेथ कहा जाता है। हालांकि, यह केवल मौत का अंतिम चरण होता है।
असल प्रक्रिया शरीर की कोशिकाओं में पहले से ही चल रही होती है। हमारे डीएनए के सिरों पर मौजूद टेलोमियर नामक संरचनाएं कोशिकाओं को सुरक्षित रखती हैं। हर बार जब कोशिका विभाजित होती है, तो ये टेलोमियर छोटे होते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब कोशिका विभाजन की सीमा समाप्त हो जाती है, जिसे हेफ्लिक लिमिट कहा जाता है।
1961 में लियोनार्ड हेफ्लिक ने बताया था कि मानव कोशिकाएं सीमित बार ही विभाजित हो सकती हैं। इसके बाद वे निष्क्रिय हो जाती हैं और शरीर में सूजन व क्षति का कारण बनती हैं। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे दिल, किडनी, लीवर और दिमाग जैसे महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करती है और अंततः उनका काम बंद हो जाता है।
टेलोमियर के छोटे होने की गति जीवनशैली पर भी निर्भर करती है। धूम्रपान, तनाव, प्रदूषण और खराब खान-पान इस प्रक्रिया को तेज कर देते हैं। वहीं, कुछ लोग लंबे टेलोमियर के कारण अधिक समय तक जीवित रहते हैं।
वैज्ञानिक टेलोमरेज नामक एंजाइम के जरिए इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो टेलोमियर को लंबा कर सकता है। हालांकि, इसका अत्यधिक सक्रिय होना कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है, क्योंकि कैंसर कोशिकाएं इसी वजह से अनियंत्रित रूप से बढ़ती रहती हैं।
फिलहाल, इंसानों में उम्र बढ़ाने की यह तकनीक पूरी तरह सफल नहीं हुई है, लेकिन शोध जारी है। यह स्पष्ट है कि मौत केवल एक घटना नहीं, बल्कि शरीर के भीतर चल रही लंबी जैविक प्रक्रिया का परिणाम है।