मुद्दों के ‘पहाड़’ के नीचे दबा देवभूमि का भविष्य : हरीश रावत

अंकिता हत्याकांड ही रहेगा 2027 चुनाव का मुख्य केंद्र और पहाड़ का सबसे बड़ा मुद्दा
सिर्फ सीबीआई जांच काफी नहीं, ‘वीआईपी’ का चेहरा बेनकाब होने तक जारी रहेगा संघर्ष
भाजपा के धनबल और पन्ना प्रमुखों का मुकाबला जनता के अटूट विश्वास से होगा
बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति
अवैध खनन और नशाखोरी ने देवभूमि की जड़ों को पूरी तरह खोखला कर दिया

अमर नाथ सिंह, देहरादून।

देवभूमि की सियासी बिसात पर इस बार ‘विकास के विज्ञापनों’ और भाजपा के संसाधनों पर पहाड़ की बेटी का ‘इंसाफ’ भारी पड़ता दिख रहा है! हालिया मुलाकात में कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत ने साफ कर दिया है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्वाभिमान की अग्निपरीक्षा भी होगी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अंकिता भंडारी हत्याकांड कोई बीता हुआ पन्ना नहीं, बल्कि भाजपा के अभेद्य किलों को ढहाने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार है। उनका सीधा संदेश है, “सरकार अगर आंदोलनों के आगे झुककर सीबीआई जांच को मजबूर हुई है, तो यह लड़ाई का अंत नहीं, बल्कि उस ‘वीआईपी’ के चेहरे से नकाब हटाने की शुरुआत है, जिसका इंतजार हर पहाड़ी दिल कर रहा है।” रावत की रणनीति साफ है, इस बार वोट ‘इंसाफ’ की बुनियाद पर मांगे जाएंगे।
दिल्ली दरबार यानी मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा पुष्कर सिंह धामी को 2027 का चेहरा घोषित किए जाने और भाजपा की 24×7 चुनावी मशीनरी की घेराबंदी पर रावत की मुस्कुराहट एक गहरी योजना की ओर इशारा करती है। जब उनसे पूछा गया कि बिना भारी-भरकम फंड और भाजपा के पन्ना प्रमुखों के अनुशासित तंत्र के सामने कांग्रेस का ‘अकेला पंजा’ कैसे टिकेगा, तो रावत के तरकश से अनुभवों के तीर निकले। उन्होंने संकेत दिया कि संसाधनों की कमी को जनता के आक्रोश और बुनियादी मुद्दों से भरा जाएगा। भाजपा भले ही खुद को ‘मालामाल’ पार्टी कहे और पन्ना प्रमुखों की फौज खड़ी कर ले, लेकिन पहाड़ का मतदाता आज बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई और पलायन के दंश से कराह रहा है। रावत का मानना है कि भाजपा का ‘विकास का शोर’ असल में एक मायाजाल है, जो जमीन पर उतरते ही गायब हो जाता है। उनके अनुसार, प्रदेश की कानून व्यवस्था पूरी तरह बेपटरी हो चुकी है और अवैध खनन व नशाखोरी ने उत्तराखंड की जड़ों को खोखला कर दिया है। ये ऐसे मुद्दे हैं जो किसी भी ‘डिजिटल मशीनरी’ पर भारी पड़ सकते हैं।
मुद्दों की ‘एक्सपायरी डेट’ के आरोपों पर प्रहार करते हुए रावत ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस इन सवालों को केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं उठा रही। वे कहते हैं कि बेरोजगारी और भर्ती घोटालों पर जो खामोशी कभी-कभी दिखती है, वह असल में बड़े आंदोलन की तैयारी होती है। भाजपा की ओर से जो चेहरा घोषित करने की जल्दी दिखाई गई है, रावत उसे उनकी घबराहट के रूप में देखते हैं। वे मानते हैं कि धामी का ‘मैजिक’ असल में सरकारी मशीनरी का विज्ञापन है, जबकि पहाड़ की असली ताकत वहां के आम नागरिक हैं जो आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। रावत का अनुभव कहता है कि जब जनता सड़क पर उतरती है, तो बड़े से बड़ा बहुमत और संसाधन धरे के धरे रह जाते हैं।
कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी और ‘भावी मुख्यमंत्री’ की दौड़ पर रावत का रुख काफी परिपक्व नजर आया। उन्होंने इसे पार्टी की कमजोरी के बजाय लोकतंत्र की जीवंतता के तौर पर पेश करने की कोशिश की। हालांकि, वे यह भी जानते हैं कि अपनों की बगावत भाजपा की आंधी से ज्यादा खतरनाक हो सकती है! लेकिन इस बार रावत का दांव ‘चेहरे’ पर नहीं, बल्कि ‘चुनौतियों’ पर है। उन्होंने साफ कर दिया है कि 2027 का मुकाबला ‘अनुभव बनाम विज्ञापन’ होगा। पहाड़ के इस कद्दावर नेता की जुबानी जो अगली कहानी लिखी जा रही है, उसमें अंकिता भंडारी को न्याय दिलाना सबसे बड़ा अध्याय है। रावत की यह धारदार रणनीति बता रही है कि वे भाजपा के ‘डबल इंजन’ की गति को इन ज्वलंत मुद्दों के जरिए धीमा करने का पूरा रोडमैप तैयार कर चुके हैं।
इस मुलाकात का सार यही है कि रावत अब बैकफुट पर खेलने के मूड में नहीं हैं। वे जानते हैं कि समय कम है और चुनाव आयोग की दस्तक के बाद भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंक देगी, लेकिन रावत की नजर उस मौन मतदाता पर है जो नशाखोरी, पलायन और बेपटरी कानून व्यवस्था से आजिज आ चुका है। क्या रावत का यह ‘अनुभव’ भाजपा के असीमित संसाधनों और पन्ना प्रमुखों के चक्रव्यूह को भेद पाएगा? यह सवाल अब देवभूमि की फिजाओं में तैर रहा है, लेकिन रावत का आत्मविश्वास यह कह रहा है कि 2027 की जंग सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान की होगी।

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