हिमंत का ‘ओरुनोडोई’ बना भाजपा का अचूक ब्रह्मास्त्र, महिलाओं का बड़ा वोट बैंक तैयार
इविक्शन’ को भाजपा ने बनाया जमीन की सुरक्षा और स्वदेशी पहचान का हथियार
गौरव गोगोई की ‘समय परिवर्तन यात्रा’ से बेदखली और बेरोजगारी पर तीखा पलटवार
मिया’ राजनीति के ठप्पे से बचकर समावेशी मॉडल पेश करने की विपक्षी कोशिश
ममता सिंह, नई दिल्ली/गुवाहाटी।
असम की सियासी बिसात पर 2026 का विधानसभा चुनाव किसी विचारधारा की लड़ाई से ज्यादा दो विपरीत रणनीतिक ध्रुवों का टकराव बन गया है। एक तरफ मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का ‘कल्याणकारी हिंदुत्व’ है, तो दूसरी तरफ गौरव गोगोई का ‘मानवीय सरोकार’ वाला मॉडल। इस बार के चुनाव प्रचार में राज्य की राजनीति दो स्पष्ट हिस्सों में बंटी नजर आती है, जहां एक पक्ष ‘ओरुनोडोई’ जैसी योजनाओं को अपना सबसे बड़ा रक्षा कवच मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष ‘इविक्शन’ यानी बेदखली के मानवीय संकट को चुनावी हथियार बना रहा है। भाजपा के लिए ‘ओरुनोडोई’ केवल एक वित्तीय सहायता योजना नहीं है, बल्कि यह करीब 40 लाख परिवारों, विशेषकर महिलाओं तक सीधे पहुंचने का एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ है जिसने राज्य में लाभार्थियों (लाभाथियों) का एक नया और वफादार वोट बैंक तैयार कर दिया है। चुनाव से ठीक पहले करोड़ों रुपयों का सीधा हस्तांतरण और महिला उद्यमिता के नाम पर दी जाने वाली राशि भाजपा के उस विमर्श को मजबूत करती है कि उसकी सरकार ‘डबल इंजन’ की रफ्तार से हर घर की रसोई तक पहुंच रही है।
हालांकि, इस कल्याणकारी चकाचौंध के दूसरी तरफ अतिक्रमण विरोधी अभियान या ‘इविक्शन ड्राइव’ की एक ऐसी कड़वी हकीकत है, जिसे भाजपा ‘जमीन की सुरक्षा’ और ‘स्वदेशी पहचान’ के संरक्षण के रूप में पेश करती है। सरकार का तर्क है कि सरकारी जमीनों और जंगलों को अवैध कब्जे से मुक्त कराना राज्य के भविष्य के लिए अनिवार्य है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे एक खास समुदाय को लक्षित करने और ध्रुवीकरण को धार देने की रणनीति के तौर पर देखा जाता है। यहीं से विपक्ष, विशेषकर गौरव गोगोई की ‘समय परिवर्तन यात्रा’ का नैरेटिव शुरू होता है। गोगोई ने बेदखली के इस अभियान को ‘मानवीय त्रासदी’ करार देते हुए इसे बेरोजगारी और बढ़ते कर्ज के साथ जोड़ दिया है। विपक्ष का यह हमला सीधा और तीखा है, ‘उनका कहना है कि एक तरफ सरकार कुछ सौ रुपये देकर वाहवाही लूट रही है, वहीं दूसरी तरफ हजारों लोगों को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उनके घरों से उजाड़कर सड़क पर ला दिया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि गौरव गोगोई इस बार केवल ‘मिया’ राजनीति के ठप्पे से बचते हुए ऊपरी असम के स्वदेशी समुदायों के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना है कि भाजपा का ‘विकास मॉडल’ असल में चुनिंदा लोगों के लिए है, जबकि आम पहाड़ी और मैदानी मतदाता आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। भाजपा जहां 50 प्रतिशत वोट शेयर का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं विपक्ष का गठबंधन इस बार ‘बिखराव’ को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है। असम की सत्ता की चाबी इस बार उस मतदाता के हाथ में होगी जो एक तरफ ‘ओरुनोडोई’ की किश्तें स्वीकार कर रहा है, तो दूसरी तरफ बेदखली के खौफ और बेरोजगारी के अनिश्चित भविष्य को लेकर सशंकित है। यह चुनाव तय करेगा कि असम की जनता ‘सुरक्षा और पहचान’ के सरकारी दावे पर मुहर लगाती है या ‘न्याय और परिवर्तन’ की विपक्षी पुकार पर भरोसा करती है।