बंगाल चुनाव से पहले मतदाता सूची पर सख्ती: 19 अपीलीय अधिकरण क्यों बने चर्चा का विषय?

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आयोग ने राज्य में **19 अपीलीय अधिकरण (Appellate Tribunals)** गठित करने की अधिसूचना जारी की है, जो मतदाता सूची से जुड़े विवादों की सुनवाई करेंगे। ([The Times of India][1])

ये अधिकरण विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के मामलों में दिए गए आदेशों के खिलाफ दायर अपीलों पर फैसला करेंगे। आयोग का यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के 10 मार्च 2026 के निर्देश और कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश के आधार पर लिया गया है। ([The Times of India][1])

गठित 19 अधिकरणों में से 18 की अध्यक्षता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे, जबकि एक अधिकरण का नेतृत्व कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति **टी. एस. शिवगणनम** करेंगे। ([Wikipedia][2]) उनके अधिकार क्षेत्र में कोलकाता उत्तर, कोलकाता दक्षिण और उत्तर 24 परगना जैसे महत्वपूर्ण चुनावी जिले शामिल होंगे, जहां मतदाताओं की संख्या और राजनीतिक संवेदनशीलता दोनों अधिक हैं।

निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि पूरक मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद प्रभावित व्यक्ति या पक्ष अपील दायर कर सकेंगे। अपील ऑनलाइन आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से या ऑफलाइन जिलाधिकारी अथवा उप मंडलाधिकारी के कार्यालय में आवेदन देकर की जा सकती है, जिसे बाद में डिजिटल प्रणाली पर अपलोड किया जाएगा।

इन अधिकरणों का कार्यकाल अस्थायी होगा और सभी लंबित अपीलों के निपटारे के बाद ये स्वतः समाप्त हो जाएंगे। इस व्यवस्था से उम्मीद है कि चुनाव से पहले मतदाता सूची में मौजूद त्रुटियों को तेजी से सुधारा जा सकेगा और अनावश्यक कानूनी विवादों से भी बचा जा सकेगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची की शुद्धता किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की विश्वसनीयता की बुनियाद होती है। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में यह कदम मतदाताओं का भरोसा बढ़ाने और चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।

 

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