आज के दौर में ज्ञान और सम्मान का अर्थ तेजी से बदलता नजर आ रहा है। जहां कभी उपाधियां और पुरस्कार वर्षों की मेहनत, अध्ययन और सामाजिक योगदान के बाद मिलते थे, वहीं अब कुछ निजी संस्थाओं ने इन्हें एक तरह के व्यापार में बदल दिया है। थोड़ी सी फीस देकर कोई भी व्यक्ति अपने नाम के आगे ‘डॉ.’, ‘महामहिम’ या ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मानित’ जैसे विशेषण जोड़ सकता है।
इन तथाकथित संस्थाओं का तरीका बेहद सरल और आकर्षक होता है। लोगों को ईमेल या व्हाट्सएप संदेश भेजकर बताया जाता है कि उन्हें उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए किसी बड़े सम्मान या मानद उपाधि के लिए चुना गया है। संदेश पढ़कर व्यक्ति गर्व महसूस करता है, लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में लिखा होता है कि ‘प्रशासनिक खर्च’ या ‘रजिस्ट्रेशन फीस’ के रूप में कुछ हजार रुपये जमा करने होंगे।
कई लोग बिना अधिक जांच-पड़ताल किए इस झांसे में आ जाते हैं, क्योंकि समाज में नाम के आगे ‘डॉ.’ या किसी सम्मान का टैग लगाना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। यही मानसिकता इन संस्थाओं के लिए कमाई का बड़ा साधन बन गई है। वे आकर्षक प्रमाणपत्र, चमकदार शील्ड और होटल में आयोजित छोटे कार्यक्रमों के जरिए सम्मान समारोह का माहौल तैयार करते हैं, जो असल में एक तरह का औपचारिक फोटो सेशन बनकर रह जाता है। 📸
समारोह के बाद सम्मानित व्यक्ति सोशल मीडिया पर अपनी उपलब्धि साझा करता है, जिससे यह दिखता है कि उसे किसी बड़े योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया है। जबकि वास्तविकता यह होती है कि यह सम्मान एक ऑनलाइन भुगतान के बदले दिया गया होता है।
इस प्रवृत्ति का सबसे गंभीर असर उन लोगों पर पड़ता है, जिन्होंने वास्तविक शिक्षा और शोध के क्षेत्र में वर्षों की मेहनत की होती है। उनकी असली डिग्रियों और उपलब्धियों की तुलना नकली उपाधियों से होने लगती है, जिससे समाज में योग्यता और मेहनत की अहमियत कम होती दिखती है।
स्थिति यह है कि अब विद्वत्ता का आकलन किताबों या कार्यों से कम और प्रमाणपत्रों की संख्या से अधिक होने लगा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सम्मान भी बाजार में बिकने लगें, तो वास्तविक प्रतिभा की पहचान कैसे होगी।