देश की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष शिक्षा बजट में बढ़ोतरी का दावा करती हैं, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार देश के 5,694 सरकारी स्कूलों में इस वर्ष एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि 11,149 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में 18,727 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि हजारों विद्यालयों का अन्य स्कूलों में विलय कर दिया गया है।
विद्यालयों का ‘विलय’ प्रशासनिक भाषा में भले ही एक प्रबंधन प्रक्रिया हो, लेकिन व्यवहार में यह बंद होने के समान ही है। जब किसी गांव या क्षेत्र का स्कूल समाप्त होता है तो वहां के बच्चों के सामने शिक्षा प्राप्त करने की राह कठिन हो जाती है। यह स्थिति किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है।
शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 748, राजस्थान में 1,952, छत्तीसगढ़ में 108, महाराष्ट्र में 18, गुजरात में 211 और उत्तरप्रदेश में 825 सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जहां शून्य नामांकन दर्ज किया गया है। उत्तराखंड की स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां 1,149 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नियुक्त नहीं है, जबकि 3,504 विद्यालय केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। लगभग 600 स्कूलों में दस से भी कम छात्र पढ़ रहे हैं।
### बढ़ता बजट, लेकिन घटती गुणवत्ता?
सरकार ने इस वर्ष शिक्षा क्षेत्र के लिए 1.39 लाख करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 11 हजार करोड़ रुपये अधिक है। पहली नजर में यह बढ़ोतरी सकारात्मक लग सकती है, लेकिन शिक्षा के व्यापक ढांचे को देखते हुए यह वृद्धि पर्याप्त नहीं कही जा सकती।
प्रश्न यह उठता है कि यदि बजट बढ़ रहा है तो विद्यालयों की स्थिति सुधर क्यों नहीं रही? आखिर क्यों प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों के बावजूद सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहा है?
दरअसल, यह समस्या एक वर्ष या एक सरकार की देन नहीं है। दशकों से चली आ रही नीतियों, सामाजिक प्रवृत्तियों और प्रशासनिक लापरवाहियों ने मिलकर इस स्थिति को जन्म दिया है।
### निजी स्कूलों की ओर झुकाव क्यों?
पिछले दो दशकों में निजी विद्यालयों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक निजी स्कूल शिक्षा का प्रमुख विकल्प बनते जा रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं—अंग्रेजी माध्यम का आकर्षण, आधुनिक सुविधाओं का दावा, और बेहतर परिणामों का प्रचार।
कुछ मामलों में सरकारी शिक्षकों की लापरवाही और अनियमितता की घटनाओं को व्यापक रूप से प्रचारित किया गया, जिससे सरकारी विद्यालयों की छवि प्रभावित हुई। दूसरी ओर, निजी संस्थानों ने शिक्षा को एक ‘ब्रांड’ के रूप में प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया।
यह भी एक कटु सत्य है कि अनेक सरकारी कर्मचारियों और स्वयं शिक्षकों ने अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना शुरू कर दिया। इससे समाज में यह संदेश गया कि यदि शिक्षक ही अपने विद्यालय पर भरोसा नहीं करते, तो आम नागरिक क्यों करे?
### क्या सरकार जिम्मेदारी से पीछे हट रही है?
आज देश में बिना सरकारी अनुदान वाले निजी विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जबकि सरकारी स्कूलों को बंद या मर्ज किया जा रहा है। इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों को धीरे-धीरे निजी क्षेत्र के हवाले करने की आशंका व्यक्त की जा रही है। निजी संस्थानों में शिक्षा महंगी है, जिससे निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
राजनीतिक परिदृश्य भी इस विमर्श से अछूता नहीं है। कई नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के निजी स्कूल और अस्पताल संचालित हैं। राजनीतिक दलों को मिलने वाला अधिकांश चंदा भी कॉरपोरेट क्षेत्र से आता है। ऐसे में यह आशंका बलवती होती है कि शिक्षा का निजीकरण कहीं न कहीं राजनीतिक-आर्थिक समीकरणों से जुड़ा है।
### समाधान क्या हो सकता है?
यदि सरकार वास्तव में सरकारी विद्यालयों को पुनर्जीवित करना चाहती है, तो ठोस और साहसिक कदम उठाने होंगे।
सबसे पहले सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों के लिए यह अनिवार्य किया जा सकता है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएं। इससे दो बड़े परिवर्तन संभव हैं—पहला, शिक्षा की गुणवत्ता में स्वतः सुधार होगा क्योंकि जिम्मेदार वर्ग सीधे इससे जुड़ा होगा; दूसरा, समाज में सरकारी विद्यालयों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।
इसके अतिरिक्त, सभी राज्यों में समान और उच्च गुणवत्ता वाला पाठ्यक्रम लागू करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। जब ‘एक देश, एक कानून’ और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, तो समान शिक्षा व्यवस्था पर क्यों नहीं?
साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षक पदों को शीघ्र भरना, आधारभूत सुविधाओं—जैसे भवन, शौचालय, पेयजल, डिजिटल संसाधन—को सुदृढ़ करना और शिक्षकों के नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था करना अनिवार्य है।
### समाज की भूमिका भी अहम
सरकारी विद्यालयों की स्थिति केवल सरकार की नीतियों का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज की सोच भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब तक हम शिक्षा को केवल ‘प्रतिष्ठा’ के चश्मे से देखेंगे, तब तक सरकारी संस्थानों का मनोबल गिरता रहेगा।
आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक गुणवत्ता के आधार पर विद्यालय का चयन करें, न कि केवल चमक-दमक या अंग्रेजी माध्यम के आकर्षण से प्रभावित होकर।
### निष्कर्ष
देश की शिक्षा व्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन और बंद होते विद्यालय हैं, तो दूसरी ओर बढ़ता शिक्षा बजट और निजी संस्थानों का विस्तार।
यदि समय रहते समग्र सुधार की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा पूरी तरह से बाज़ार आधारित व्यवस्था में बदल सकती है, जहां गुणवत्ता से अधिक भुगतान क्षमता मायने रखेगी।
सरकार, समाज और शिक्षकों—तीनों को मिलकर इस चुनौती का समाधान तलाशना होगा। क्योंकि शिक्षा केवल व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।