खेमचंद सरकार में दो जनजाति मंत्री, फिर भी जातीय दरार बरकरार
वर्चुअल शपथ से उजागर हुई समुदायों के बीच दूरी, कुकी अब भी अड़े पृथक प्रशासन की मांग पर
ममता सिंह, नई दिल्ली/ इम्फाल ।
मणिपुर के राजनीतिक परिदृश्य पर करीब एक साल के लंबे अंतराल के बाद लोकतांत्रिक बहाली तो हो गई है, लेकिन धरातल की खूनी सच्चाई और समुदायों के बीच अविश्वास की दीवारें अब भी जस की तस हैं। 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुच्छेद 356 को हटाने की अधिसूचना के साथ ही राज्य में राष्ट्रपति शासन का अंत हुआ और ताइक्वांडो के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी युमनाम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राजभवन की चमक-धमक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाओं के बीच इम्फाल घाटी से लेकर पहाड़ों तक जो तस्वीर उभरी है, वह सत्ता परिवर्तन से कहीं अधिक गहरे संकट की ओर इशारा करती है। शपथ ग्रहण के तत्काल बाद जिरीबाम और कांगपोकपी जैसे इलाकों में हुई हिंसक झड़पें इस बात की गवाह हैं कि मणिपुर के लिए केवल नेतृत्व बदलना शांति की गारंटी नहीं है।
केंद्र सरकार ने इस बार जातीय संतुलन साधने के लिए दो उपमुख्यमंत्री बनाने का प्रयोग किया है, जिसमें नगा समुदाय के लोसी दीखो और कुकी-जो समुदाय की नेमचा किपगेन को जिम्मेदारी सौंपी गई है। हालांकि, मनोवैज्ञानिक रूप से मणिपुर आज भी कितना बंटा हुआ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुकी समुदाय से आने वाली नेमचा किपगेन को दिल्ली स्थित मणिपुर भवन से वर्चुअली शपथ लेनी पड़ी। कुकी-जो संगठनों ने इस भागीदारी को सिरे से नकारते हुए इसे विश्वासघात करार दिया है और वे अब भी ‘पृथक प्रशासन’ या केंद्र शासित प्रदेश की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें तो मुख्यमंत्री खेमचंद के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक नहीं बल्कि मानवीय है। उन्हें उन 60,000 विस्थापितों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करना है जो आज भी राहत शिविरों में अपनी उजड़ी हुई जिंदगी के अवशेष देख रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में एन. बीरेन सिंह की विदाई और खेमचंद की ताजपोशी को भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है ताकि एक विवादरहित और ‘न्यूट्रल’ चेहरे के जरिए संवाद के बंद पड़े रास्तों को फिर से खोला जा सके। लेकिन वर्तमान हालात किसी भी प्रशासक के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं, जहाँ गृह और राजस्व जैसे महत्वपूर्ण विभागों के बंटवारे पर हर समुदाय अपनी दावेदारी ठोक रहा है। सुरक्षा एजेंसियों की चिंता यह है कि राष्ट्रपति शासन हटने के बाद कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी अब फिर से राज्य पुलिस के पास है, जबकि समुदायों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि केंद्रीय बलों के बिना शांति बनाए रखना एक असंभव कार्य प्रतीत होता है। यदि यह नई सरकार केवल एक संवैधानिक औपचारिकता बनकर रह जाती है और ‘बफर जोन्स’ की कड़वी सच्चाई नहीं बदलती, तो मणिपुर एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा रहेगा जहाँ बंदूक की गूंज के आगे संवाद की हर कोशिश दम तोड़ देगी।