ममता सिंह, नई दिल्ली/शिलांग।
- प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने जताया दुख, हताहतों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की
- असम और नेपाल के प्रवासी मजदूर भी शामिल, दो रैट होल खदान मालिक गिरफ्तार
- एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद अवैध रूप से चल रहा था खूनी खनन।
मेघालय के सुतंगा क्षेत्र में बीते गुरुवार को हुए भीषण डायनामाइट विस्फोट ने एक बार फिर रैट होल माइनिंग के खूनी खेल को उजागर कर दिया है। 7 फरवरी 2026 की सुबह तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस हृदयविदारक हादसे में आधिकारिक मृत्यु संख्या बढ़कर 25 हो गई है, लेकिन स्थानीय सूत्रों और लापता श्रमिकों के परिजनों का अंदेशा है कि यह आंकड़ा 70 के पार जा सकता है। एनडीआरएफ और राज्य की बचाव टीमें मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश में जुटी हैं, जबकि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो खदान मालिकों को गिरफ्तार कर लिया है। यह विस्फोट हाल के वर्षों में मेघालय की खदानों में हुआ सबसे घातक हादसा माना जा रहा है, जिसकी भयावहता 2019 के लुमथरी कांड से भी कहीं अधिक है।
मेघालय हाईकोर्ट ने इस घटना पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के प्रशासनिक तंत्र को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है, तो भारी मात्रा में डायनामाइट का इस्तेमाल कर पहाड़ों का सीना कैसे चीरा जा रहा है। जांच में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया है कि इस अवैध खनन के पीछे बांग्लादेशी कोयला तस्करों का एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट सक्रिय है। सीमा पर निगरानी के दावों के बावजूद यह नेटवर्क बेखौफ होकर अवैध कोयले की तस्करी कर रहा है और ऊंचे मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर मौत का जाल बिछा रहा है।
हादसे का सबसे संवेदनशील पहलू इसमें हताहत हुए मजदूरों की पहचान है। जान गंवाने वालों में न केवल मेघालय के स्थानीय श्रमिक हैं, बल्कि असम के कछार जिले और पड़ोसी देश नेपाल के प्रवासी मजदूर भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। असम प्रशासन ने अपने क्षेत्र के छह मजदूरों की मौत की पुष्टि की है। यह स्पष्ट संकेत है कि मेघालय की अवैध खदानों में अब बाहरी मजदूरों को एक संगठित लेबर ट्रांजिट हब के जरिए मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने घटना पर गहरा दुख जताते हुए सहायता का ऐलान किया है, लेकिन 25 जिंदगियां गंवाने के बाद अब भी सवाल वही है कि क्या महज मुआवजा और गिरफ्तारी इन अवैध सुरंगों में दफन होती मासूमों की चीखें रोक पागी।