धर्मपाल धनखड़ | नज़रिया चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन वादों पर अब **सुप्रीम कोर्ट** की निर्णायक नजर पड़ने जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय को गंभीर जनहित का मुद्दा मानते हुए कहा है कि इसकी सुनवाई **तीन जजों की पीठ** द्वारा की जानी चाहिए। यह मामला मार्च में सूचीबद्ध किया जाएगा।
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अदालत में दलील दी कि चुनावों के समय राजनीतिक दल ऐसे वादे करते हैं जिनका आर्थिक और संवैधानिक आधार नहीं होता। “चांद-सूरज को छोड़कर सब कुछ देने का वादा” लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है और यह **भ्रष्ट आचरण** की श्रेणी में आता है। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सहमति जताते हुए विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता बताई।
याचिका में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से मांग की गई है कि **चुनावी घोषणापत्रों को नियंत्रित करने** और सार्वजनिक धन से जुड़े वादों पर जवाबदेही तय करने के लिए दिशा-निर्देश बनाए जाएं।
असल समस्या यह है कि सरकारें अपने कार्यकाल के अधिकांश समय विकास और भर्तियों को टालती रहती हैं। अंतिम छह महीनों में योजनाओं और नौकरियों की झड़ी लगाकर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया जाता है। कई बार अधूरी या नियमों की अनदेखी कर की गई भर्तियां अदालतों में रद्द हो जाती हैं, जिससे युवाओं का भविष्य अधर में लटक जाता है।
हाल के वर्षों में चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खातों में सीधे धनराशि भेजने की योजनाओं ने चुनावी समीकरण ही बदल दिए। तात्कालिक राहत जरूर मिलती है, लेकिन दीर्घकाल में यह नीति **सरकारी खजाने पर भारी बोझ** डालती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधन कम पड़ जाते हैं और अंततः करों व कर्ज़ का भार जनता पर ही आता है।
लोकतंत्र में सरकार को पांच साल के लिए चुना जाता है, न कि अंतिम छह महीने के लिए। विकास कार्य और भर्तियां एक सतत प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि चुनावी हथियार। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर ऐसा संतुलित रास्ता निकालेगा, जिससे लोककल्याण और आर्थिक अनुशासन—दोनों सुरक्षित रह सकें।
