धर्मपाल धनखड़
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा छेड़े गए टैरिफ युद्ध के बीच भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच संपन्न हुई फ्री ट्रेड डील न केवल एक आर्थिक समझौता है, बल्कि यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में एक सशक्त और शालीन रणनीतिक जवाब भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन ने 16वीं भारत-ईयू समिट के दौरान इस ऐतिहासिक समझौते की घोषणा कर दुनिया को एक स्पष्ट संदेश दिया है।
इस डील के तहत 27 देशों वाले यूरोपीय यूनियन के बाजार भारतीय उत्पादों के लिए लगभग पूरी तरह खुल गए हैं। 99 प्रतिशत भारतीय उत्पादों को या तो टैक्स फ्री या बेहद कम शुल्क पर यूरोप में प्रवेश मिलेगा। वहीं भारत ने भी यूरोपीय देशों के 97 प्रतिशत उत्पादों के लिए अपने बाजार खोल दिए हैं। इस समझौते पर लंबे समय से वैश्विक समुदाय की निगाहें टिकी थीं और इसके वास्तविक आर्थिक प्रभाव आने वाले एक वर्ष में स्पष्ट होंगे।
ट्रंप के टैरिफ अटैक ने दशकों से चली आ रही वैश्विक व्यापार व्यवस्था को झकझोर दिया था। इस व्यापार युद्ध का असर केवल प्रतिद्वंद्वी देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी यूरोपीय यूनियन को भी अपनी विदेश और व्यापार नीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। ऐसे अस्थिर वैश्विक माहौल में भारत और यूरोप के बीच 18 वर्षों से लंबित इस ट्रेड डील का पूरा होना एक नए संतुलन की ओर संकेत करता है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार देते हुए इसे दो बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच साझेदारी का नया अध्याय बताया, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने इसे साझा समृद्धि का ब्लूप्रिंट कहा।
इस डील से भारत को कृषि, टेक्सटाइल और मेटलर्जी उत्पादों के लिए बड़े बाजार मिलेंगे, जबकि यूरोप की तकनीक, लक्जरी वाहन, शराब और आधुनिक रक्षा उपकरण भारतीय बाजार में सस्ते हो सकेंगे। उल्लेखनीय है कि रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर कोई शर्त नहीं लगाई गई, जिससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता भी बनी रही।
विश्व अर्थव्यवस्था के एक चौथाई हिस्से और वैश्विक व्यापार के एक तिहाई का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों के बीच हुई यह डील यह संकेत देती है कि दुनिया अब अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़ने को तैयार है।