म्यांमार के चुनाव: पूर्वोत्तर भारत में सीमा-सुरक्षा की बढ़ती चुनौती के बीच भारत को स्थिर सरकार की उम्मीद !
नव ठाकुरीया
म्यांमार में प्रस्तावित चुनाव केवल उस देश की आंतरिक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि उनका सीधा प्रभाव भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, स्थिरता और रणनीतिक हितों पर पड़ता है। चार वर्षों से अधिक समय से सैन्य शासन के अधीन म्यांमार आज राजनीतिक अनिश्चितता, सशस्त्र संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय दबाव के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में चुनावों की घोषणा ने भारत सहित पूरे क्षेत्र की चिंताओं को फिर से सतह पर ला दिया है।
भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1,640 किलोमीटर लंबी खुली और दुर्गम सीमा है, जो मिज़ोरम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से जुड़ी है। म्यांमार में अस्थिरता बढ़ते ही इन सीमावर्ती इलाकों में उग्रवादी गतिविधियाँ, हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों का नेटवर्क और अवैध आवाजाही तेज़ हुई है। मणिपुर संकट के दौरान म्यांमार से शरणार्थियों का आना इस अस्थिरता का प्रत्यक्ष उदाहरण रहा है।
म्यांमार की सेना द्वारा कराए जाने वाले चुनावों की वैधता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई प्रमुख विपक्षी दलों पर प्रतिबंध है, अनेक क्षेत्रों में सशस्त्र जातीय समूहों का नियंत्रण है और स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की अनुपस्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। इसके बावजूद भारत का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत व्यावहारिक और संतुलित रहा है। नई दिल्ली का आकलन है कि चाहे प्रक्रिया कितनी भी अपूर्ण हो, म्यांमार में एक कार्यशील और अपेक्षाकृत स्थिर सरकार का होना पूर्ण अराजकता से बेहतर है।
पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिहाज़ से म्यांमार में सत्ता का शून्य सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। सीमा पार उग्रवादी गुटों को सुरक्षित पनाह मिलना, भारत विरोधी गतिविधियों का संचालन और ड्रग्स तस्करी के ज़रिये युवा पीढ़ी को निशाना बनाना — ये सभी चुनौतियाँ सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं। इसी कारण भारत ने म्यांमार के साथ सुरक्षा सहयोग, खुफिया समन्वय और सीमित सैन्य संवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं किया है।
रणनीतिक दृष्टि से म्यांमार भारत की Act East Policy का एक अहम स्तंभ है। कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांज़िट परियोजना और भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएँ तभी आगे बढ़ सकती हैं, जब म्यांमार में न्यूनतम प्रशासनिक स्थिरता बनी रहे। लंबे समय तक जारी गृहयुद्ध न केवल इन परियोजनाओं को बाधित करता है, बल्कि क्षेत्र में चीन के प्रभाव को भी बढ़ाता है, जो भारत के लिए अतिरिक्त रणनीतिक चुनौती है।
इसी संदर्भ में भारत की नीति स्पष्ट दिखाई देती है। एक ओर नई दिल्ली लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत को देखते हुए उसकी प्राथमिकता पूर्वोत्तर भारत की शांति, सीमा-सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनी हुई है। भारत किसी एक राजनीतिक धड़े का खुला समर्थन करने से बचते हुए यह उम्मीद लगाए बैठा है कि चुनावों के बाद म्यांमार में ऐसा सत्ता ढांचा उभरे, जो कम से कम हिंसा को नियंत्रित कर सके और पड़ोसी देशों के साथ संवाद बनाए रखे।
अंततः, म्यांमार के चुनाव भारत के लिए उम्मीद और आशंका — दोनों का मिश्रण हैं। पूर्वोत्तर भारत की जटिल सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत यह भली-भांति समझता है कि एक अपूर्ण लेकिन स्थिर सरकार, एक विफल और अराजक राज्य से कहीं बेहतर विकल्प है। यही कारण है कि तमाम संदेहों के बावजूद, भारत म्यांमार में स्थिर सरकार की उम्मीद बनाए हुए है।
(पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)