किसानों की आय बढ़ाने वाली यह किस्म 9 महीने में तैयार, 17.21 टन/हेक्टेयर तक उपज
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
लुमामी (नगालैंड)। नगालैंड विश्वविद्यालय ने अदरक की एक नई उच्च उपज वाली किस्म ‘SAS-KEVÜ’ विकसित की है। यह किस्म बेहतरीन उपज, अधिक शुष्क पदार्थ (21.95%), कम रेशा, मुलायम बनावट, मोटे प्रकंद और आकर्षक नींबू-पीले गूदे के लिए जानी जा रही है। इससे ताज़ा अदरक बेचने वाले किसानों से लेकर अचार, कैंडी, पेय पदार्थ और मसाला उद्योग तक सभी को फायदा होगा।यह किस्म हाल ही में भारत के राजपत्र (सं. सीजी-डीएल-ई-04092025-265957) में प्रकाशित हो चुकी है और बीज अधिनियम-1966 के तहत नगालैंड, मिज़ोरम, पश्चिम बंगाल व आंध्र प्रदेश में बीज उत्पादन एवं बिक्री की आधिकारिक अनुमति मिल चुकी है।
प्रमुख विशेषताएं एक नजर में:
औसत उपज: 17.21 टन प्रति हेक्टेयर (राष्ट्रीय चेक किस्म से 9% अधिक)
शुष्क पदार्थ पुनर्प्राप्ति: 21.95% (प्रोसेसिंग के लिए बहुत अच्छा)
फसल अवधि: केवल 9 महीने
प्रकंद: मोटे, गूदेदार, कम रेशेदार, नींबू-पीला गूदा
उपयोग: ताज़ा बिक्री, अचार, कैंडीड जिंजर, पेय पदार्थ, मसाला पाउडर आदि
एक दशक का शोध, मजबूत परिणाम
कृषि विज्ञान संकाय के प्रो. सीएस मैती व डॉ. ग्रेसली आई. येप्थोमी के नेतृत्व में 2014 से शुरू हुए इस शोध में नगालैंड की स्थानीय ‘नादिया’ अदरक के 19 क्लोन एकत्र कर उनका विस्तृत अध्ययन किया गया। इनमें क्लोन NDG-11 सबसे बेहतरीन पाया गया, जिसे बाद में SAS-KEVÜ नाम दिया गया।2018-2022 के बीच आंध्र प्रदेश, केरल, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल व सिक्किम सहित सात स्थानों पर राष्ट्रीय समन्वित परीक्षण किए गए। सभी जलवायु क्षेत्रों में यह किस्म स्थिर और श्रेष्ठ प्रदर्शन करने में सफल रही।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक ने कहा, “SAS-KEVÜ से देश की अदरक मूल्य शृंखला मजबूत होगी और पूर्वोत्तर के किसानों को लाभ होगा। यह टिकाऊ व लाभकारी बागवानी की दिशा में बड़ा कदम है।”
प्रो. सीएस मैती ने बताया, “यह पूर्वोत्तर के किसी संस्थान द्वारा विकसित अदरक की पहली आधिकारिक किस्म है। स्थानीय जेनेटिक संसाधनों का उपयोग कर राष्ट्रीय लाभ पहुंचाना हमारा लक्ष्य रहा है।”
डॉ. ग्रेसली आई. येप्थोमी ने कहा, “अब किसान आत्मविश्वास के साथ इस किस्म के बीज लगा सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पूर्वोत्तर सहित पूरे देश में लोकप्रिय होगी।”
नगालैंड विश्वविद्यालय की यह उपलब्धि एक बार फिर साबित करती है कि पूर्वोत्तर भारत भी कृषि नवाचार व वैज्ञानिक उत्कृष्टता में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।