गाय के गोबर से दीपक और मूर्तियां बना रहे दिव्यांग, बुंदेलखंड में आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल!

बुंदेलखंड में दिव्यांगजन अब आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहे हैं। **बुंदेलखंड सोसायटी फॉर रूरल डेवलेपमेंट** संस्था की अनूठी पहल से यहां के दिव्यांग गाय के गोबर से आकर्षक **मूर्तियां, दीपक, धूपबत्तियां और सजावटी सामान** तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल उन्हें रोजगार मिल रहा है, बल्कि वे समाज में आत्मसम्मान के साथ अपनी पहचान बना रहे हैं।

संस्था के प्रबंधक **आकाश राय** ने बताया कि संगठन द्वारा 20 से अधिक दिव्यांगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें **शालिनी प्रजापति, प्रीति, इंद्रेश यादव, दिनेश, लवली, दिव्या, मनोज, शिखा, अखिलेश, ऊषा, बबलू, आशीष और श्याम बिहारी** जैसे लोग शामिल हैं, जो अब मिट्टी और गाय के गोबर से सुंदर कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं।

इन दिव्यांग कारीगरों द्वारा तैयार की जा रही वस्तुओं में **राम दरबार, लक्ष्मी-गणेश, भगवान शंकर की प्रतिमाएं, मोमेंटो और आकर्षक दीपक** शामिल हैं। दीपक बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह **ईको-फ्रेंडली** है। इसके लिए गौशाला से गोबर लाया जाता है और उसमें **इमली के बीज, मैदा और लकड़ी के पाउडर** का मिश्रण मिलाया जाता है। बाद में उसमें **मुल्तानी मिट्टी** डालकर सांचे के माध्यम से आकार दिया जाता है, धूप में सुखाया जाता है और फिर रंग भरकर पैकिंग की जाती है।

संस्था की प्रशिक्षक **दीपशिखा आकाश राय** ने बताया कि दिव्यांगों को यह प्रशिक्षण **देवेंद्र प्रजापति** द्वारा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य न केवल रोजगार देना है, बल्कि दिव्यांगजनों को **वोकल फॉर लोकल** अभियान से जोड़कर उन्हें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी अग्रसर करना है।

संस्था ने एक और सराहनीय कदम उठाया है — **मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों से धूपबत्तियां बनाना।** दीपशिखा ने बताया कि मंदिरों से एकत्रित फूलों को सुखाकर पाउडर तैयार किया जाता है, जिससे धूपबत्तियां बनाई जाती हैं। इससे **पानी और वातावरण दोनों को प्रदूषण से बचाया जाता है**, और फूलों का पुनः सदुपयोग भी हो जाता है।

यह पहल न केवल दिव्यांगों के जीवन को उजाला दे रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बना रही है। इन उत्पादों की बाजार में मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे दिव्यांगजन आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

बुंदेलखंड में यह प्रयास दिखाता है कि यदि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो दिव्यांगजन भी आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार कर सकते हैं।

 

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