मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत का रहस्य खुला: कफ सिरप में मिलावट, डॉक्टर प्रवीण सोनी गिरफ्तार!

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया क्षेत्र में **कफ सिरप से 11 बच्चों की मौत** की घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। शनिवार देर रात प्रशासन ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए **डॉक्टर प्रवीण सोनी** और **श्रेसन फार्मास्युटिकल कंपनी (कांचीपुरम, तमिलनाडु)** के खिलाफ FIR दर्ज की। इसके बाद पुलिस अधीक्षक द्वारा गठित स्पेशल टीम ने डॉक्टर प्रवीण सोनी को **राजपाल चौक, छिंदवाड़ा** से गिरफ्तार किया।

जानकारी के अनुसार, यह वही डॉक्टर हैं जिन्होंने बच्चों को वह कफ सिरप लिखा था, जिसके कारण उनकी जानें चली गईं। स्वास्थ्य विभाग के बीएमओ **डॉ. अंकित सल्लाम** की शिकायत पर यह कार्रवाई की गई। दरअसल, तमिलनाडु से प्राप्त कफ सिरप के सैंपलों की जांच में **कोल्ड्रिफ कफ सिरप में डायएथिलीन ग्लाइकोल** की मात्रा अधिक पाई गई, जो बच्चों के लिए बेहद घातक थी।

पुलिस ने डॉक्टर और कंपनी के खिलाफ **बीएनएस धारा 276 (औषधियों में मिलावट), बीएनएस धारा 105(3) (आपराधिक मानव वध)** और **ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 27(ए)(iii) और 26** के तहत मामला दर्ज किया है। इन धाराओं में **10 साल से लेकर आजीवन कारावास** तक की सजा का प्रावधान है।

मृत बच्चों की आयु **1 से 5 साल** के बीच थी। सभी बच्चों को सामान्य सर्दी, खांसी और बुखार था, और वे डॉक्टर प्रवीण सोनी के क्लिनिक में उपचार के लिए पहुंचे थे। बच्चों को कफ सिरप देने के बाद कुछ समय तक उनकी हालत सुधरी, लेकिन दो दिन बाद **पेशाब बंद होने** से उनकी स्थिति गंभीर हो गई। परिवारों ने छिंदवाड़ा और नागपुर तक इलाज कराया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी।

स्वास्थ्य विभाग के डॉ. सल्लाम ने बताया कि प्रारंभिक जांच में दवा **मिलावटी (एडलट्रेडेट)** पाई गई है। उन्होंने कहा कि विभाग इस पूरे मामले को गंभीरता से देख रहा है और वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय स्तर पर जांच जारी है। यदि और किसी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

मुख्यमंत्री **डॉ. मोहन यादव** ने बच्चों की मौत को दुखद बताया और प्रभावित परिवारों को **4-4 लाख रुपये आर्थिक सहायता** देने की घोषणा की। प्रशासन ने अभिभावकों से अपील की है कि बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी प्रकार का सिरप बच्चों को न दें।

यह घटना न केवल डॉक्टर और फार्मास्यूटिकल कंपनी की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और दवा मानकों की जाँच पर भी सवाल खड़ा करती है।

 

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