देहरादून। दून विश्वविद्यालय में प्रज्ञा प्रवाह की उत्तराखंड इकाई देवभूमि विचार मंच द्वारा आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी में डेमोग्राफिक परिवर्तन : वर्तमान और भविष्य विषय पर गहन चर्चा हुई।



इस अवसर पर मुख्य वक्ता पद्मश्री श्री जतिंदर कुमार बजाज, विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र भसीन और विशिष्ट उपस्थिति श्रीमान भगवती प्रसाद राघव की रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने की।
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. बजाज ने कहा कि डेमोग्राफी परिवर्तन कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत मुस्लिम शासन काल से हुई और यह ब्रिटिश काल व विभाजन के बाद और तेजी से बढ़ा। उन्होंने चेताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहा यह बदलाव सामरिक और सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर खतरा बन सकता है। उत्तर-पूर्वी राज्यों, बिहार-बंगाल-बांग्लादेश की सीमा से लगे क्षेत्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड में भी इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी गहरे प्रश्न उठाता है।
डॉ. देवेंद्र भसीन ने उत्तराखंड में हो रहे बदलाव पर चिंता व्यक्त की और इस पर ठोस कार्ययोजना बनाने की अपेक्षा जताई। उन्होंने प्रज्ञा प्रवाह के गंगा शोध केंद्र द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना भी की।
कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि समाज को इस मुद्दे पर सतर्क रहने की आवश्यकता है। बाहर से आने वाले लोगों का रिकॉर्ड सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से रखा जाना चाहिए, ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना किया जा सके।
इस अवसर पर प्रोफेसर रीना चंद्रा ने कार्यक्रम का संचालन किया, वहीं डॉ. अंजली वर्मा ने प्रज्ञा प्रवाह के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। कार्यशाला के विषय प्रस्तुति डॉ. विकास सारस्वत ने दी।
पलायन आयोग के सदस्य श्री सुरेश सुयाल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. रवि शरण दीक्षित ने कहा कि आज निकले निष्कर्षों को एक विस्तृत रूपरेखा के रूप में सरकार व समाज के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।