नई दिल्ली। सहकारिता क्षेत्र को ग्रामीण विकास की रीढ़ बनाते हुए केंद्र सरकार ने देशभर के गांवों में सहकारी समितियों के गठन की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। मंगलवार को लोकसभा में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने 15 फरवरी 2023 को सहकारी आंदोलन को ग्राम स्तर तक सशक्त बनाने की एक व्यापक योजना को मंजूरी दी थी। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में देश के हर गांव और पंचायत में दो लाख बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि साख समितियां (एम-पीएसीएस), डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियां गठित की जाएंगी।
अमित शाह ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि यह योजना विभिन्न केंद्रीय योजनाओं जैसे डेयरी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (DIDF), राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) आदि के साथ समन्वय बनाकर लागू की जा रही है। इस समन्वय में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB), राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) और राज्य सरकारों की प्रमुख भूमिका निर्धारित की गई है।
मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस के अनुसार, 30 जून 2025 तक कुल 22,606 नई एम-पीएसीएस, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों को पहले ही पंजीकृत किया जा चुका है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि योजना की दिशा में कार्य प्रगति पर है और सरकार का उद्देश्य सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना है।
एसओपी से क्रियान्वयन को दिशा
शाह ने बताया कि योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए 19 सितंबर 2024 को सहकारिता मंत्रालय द्वारा नाबार्ड, एनडीडीबी और एनएफडीबी के सहयोग से एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) भी जारी की गई है। इस मार्गदर्शिका में सभी संबंधित एजेंसियों की भूमिकाएं, लक्ष्यों और कार्यों की समय-सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सहकारी समितियों का गठन एक संगठित, पारदर्शी और प्रभावी प्रक्रिया के तहत हो।
एसओपी में यह भी बताया गया है कि विभिन्न राज्यों में कितनी समितियों का गठन किया जाना है। उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश में कुल 4,188 एम-पीएसीएस, 9,149 डेयरी सहकारी समितियां और 200 मत्स्य सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
लेकिन प्रगति में कुछ राज्यों में धीमापन
हालांकि, वास्तविकता यह दर्शाती है कि कुछ राज्यों में योजनानुसार प्रगति नहीं हो पाई है। राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस के अनुसार, 30 जून 2025 तक आंध्र प्रदेश में सिर्फ 891 डेयरी सहकारी समितियां और 2 मत्स्य सहकारी समितियां ही पंजीकृत की जा सकी हैं। इनमें से 5 समितियां कृष्णा जिले में हैं। इस अंतर से स्पष्ट होता है कि राज्य स्तर पर क्रियान्वयन में कुछ अड़चनें हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।
ग्रामीण विकास में सहकारिता की भूमिका
सरकार का मानना है कि सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं, कृषि उत्पादन को बेहतर विपणन उपलब्ध कराया जा सकता है, तथा डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों को सुदृढ़ किया जा सकता है। इससे न केवल ग्रामीणों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी बल मिलेगा।
अमित शाह ने कहा कि यह योजना ‘सहकार से समृद्धि’ के मंत्र को साकार करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में देश के प्रत्येक गांव में कम से कम एक बहुउद्देशीय सहकारी समिति कार्यरत होगी, जो ग्रामीण समुदायों के आर्थिक और सामाजिक विकास का आधार बनेगी।
निष्कर्ष
देशभर में सहकारी समितियों के गठन की यह योजना न केवल एक प्रशासनिक पहल है, बल्कि यह ग्रामीण भारत को सशक्त करने की दिशा में एक बड़ा सामाजिक-आर्थिक प्रयास भी है। जहां कई राज्यों में इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हो रही है, वहीं कुछ राज्यों में सुस्ती भी देखने को मिल रही है। सरकार का अगला लक्ष्य इस असमानता को दूर करते हुए सभी क्षेत्रों में समान रूप से योजना को लागू करना होगा, ताकि हर गांव वास्तव में सहकारिता से समृद्ध हो सके।