अखंड सौभाग्यवती, पति की लंबी आयु एवं पति की प्राप्ति के लिए सौभाग्यवती महिलाएं एवं कुमारी लड़कियां करती हैं तीज नीलम सिंह

अखंड सौभाग्यवती के लिए माता पार्वती के बताएं मार्गों पर चलकर तीज करती हैं महिलाएं पूनम देवी

रामगढ़। पौराणिक कथाओं, मान्यताओं एवं परंपराओं के आधार पर युगो युगांतर से चली आ रही निर्जला हरितालिका तीज व्रत को सौभाग्यवती महिलाएं एवं कुंवारी लड़कियां इस व्रत को सदियों से करते चली आ रही है। शुक्रवार को महिलाएं निर्जला व्रत का पालन करते हुए विधि विधान के अनुसार भगवान शिव एवं माता पार्वती के प्रतिमा के सामने पूजा करती हैं और रात्रि जागरण भी करती हैं। हर व्रत के करने के पीछे कुछ ना कुछ कहानी होती हैं और इसके पीछे भी एक कहानी है, जिसके आधार पर हरितालिका तीज व्रत किया जाता है। इस संबंध में पूछने पर बरसों बरस से व्रत करते चली आ रही नीलम सिंह ने बताया कि हिमालय राज की पुत्री पार्वती अविवाहित रहते हुए भगवान शंकर को अपना पति मान बैठी और घोर तपस्या 12 वर्षों तक की, प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने माता पार्वती को अपना पत्नी मानते हुए शादी किये, और उसी समय से हरितालिका तीज की पूजा की जाती है। इसमें सौभाग्यवती महिलाएं अपने को अखंड सौभाग्यवती रहे और पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं। इस संबंध में पूछने पर पूनम देवी एवं पूनम कुमारी ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल तृतीया हस्त नक्षत्र में मिट्टी के शिवलिंग का निर्माण माता पार्वती की मूर्ति के साथ विधि विधान के साथ पूजा किया जाता है, हम सब महिलाएं रात्रि जागरण करते हैं और सुबह पूजा संपन्न करने के बाद अपने उपवास को तोड़ते हैं। हरितालिका नाम क्यों पड़ा पूछने पर दोनों ने संयुक्त रूप से कहा कि हिमालय राज की पुत्री पार्वती के द्वारा भगवान शंकर को पति मानकर पाने की इच्छा को देखते हुए पार्वती को घर से अपहरण कर सखियां जंगल में पूजा करवाई, इसीलिए इसका नाम हरितालिका तीज पड़ा। हरितालिका व्रत करने वाली महिलाओं में गीता देवी, अनीता देवी, अंजलि सिंह, विनीता देवी, गीता देवी, अनिता कुमारी, जूही देवी, कल्पना देवी सहित दर्जनों महिलाओं ने हरितालिका व्रत रखी। विधि विधान से पूजा नारायण पांडे ने कराया। इसमें महिलाओं को हरा या लाल रंग का साड़ी पहनना पड़ता है। इसकी पूजा प्रदोष काल में की जाती है।

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