सरकारों की उपेक्षा से अभी तक सडक़ की राह देख रहे हैं ग्रामीण
पुरोला। पुरोला विधान सभा के अंतर्गत आजादी के 75 वर्षों तक भी दर्जनों गांव सडक़ की राह देखते डिजिटल भारत मे भी आदिवासी जीवन जीने को मजबूर हैं। इतना ही नही स्वास्थ्य व शिक्षा जैसे मूलभूत सुविधाओं के लिए भारी मसक्कत कर कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ रही है।
सडक़ को जंहा विकास की राह को प्रथम कड़ी माना जाता हैं वंही क्षेत्र के दर्जनों गांव देश के अमृत काल तक भी सडक़ मार्ग से अपने गांव तक पंहुचने के सपने ही देख रहे हैं। सडक़ों के अभाव में जंहा मरीजों,बृहदजनों,प्रसव पीडि़ताओं को अस्पताल तक पंहुचाने में भारी दिक्कतें हो रही हैं वंही प्राथमिक व उच्चप्राथमिक शिक्षा के बाद कस्बों की ओर कई किलोमीटर पैदल या फिर गांव छोडक़र शिक्षा ग्रहण करने को कस्बों तथा शहरों की ओर पलायन की मजबूरी से जूझते नजर आते हैं। बागवानी,पशुपालन व मटर,आलू,राजमा आदि कई नगदी फसलों के लिए प्रसिद्ध यह क्षेत्र जंहा शून्य पलायन है,सडक़ो के अभाव में शिक्षा व स्वास्थ्य कारणों से कस्बों व शहरों की ओर अब बसने लगे हैं जंहा अपनी पारम्परिक खेतीबाड़ी व बागवानी की दिशा में उत्साह में कमी नजर आती है। बताते चलें कि रंवाई घाटी की पुरोला विधान सभा के अंतर्गत मोरी,पुरोला व कुछ हिस्सा नौगांव विकासखण्ड का भी जुड़ा है जिसमे 27 गांव अभी भी सडक़ विहीन है।
मोरी विकासखण्ड में सेवा, बरी, खन्ना, साँवड़ी, शटूड़ी, लिवाड़ी, धारा, ओसला,गंगाड,बैनोल,देवती,
विधायक दुर्गेश्वर लाल :सडक़,स्वास्थ्य व शिक्षा को लेकर मेरी पहली प्राथमिकता है मेरी विधानसभा में कई गांवों की सडक़ों की वित्तीय स्वी.तियां हो चुकी है व सडक़ निर्माणाधीन हैं जबकि सडक़ से अछूते कई गांवों की डीपीआर तैयार हैं जिसमे जल्दी ही आने वाले वर्षों में कार्य पूर्ण होगा।
पीके मिश्रा: सहायक अभियंता लोनिवि- क्षेत्र के सडक़ विहीन कई गांवों में सडक़ निर्माण कार्य जारी हैं तथा कई गांवों की डीपीआर शासन व फारेस्ट क्लियरेंस के लिए प्रगति पर हैं वंही 25 से अधिक आबादी वाले कई गांव पीएमजीएसवाई में चले गए हैं।