क्योंकि, यह महज कुआं नही, यहां इतिहास की जलधारा है

सोमनाथ आर्य
बिहार के असरगंज प्रखंड के लगमा गांव में एक मौर्यकालीन कुआं ( इनारा) है । जिसे सम्राट असोक ( शुद्ध नाम असोक है अशोक नहीं ) ने (304-232 ईसा पूर्व) में बनवाया था। यह कुआं आज भी अपनी खसियत के लिए प्रसिद्ध है। पहली खासियत यह कितनी भी भीषण गर्मी हो नही सूखती। दूसरी इसका पानी काफी मीठा है।


तीसरी खासियत है इसके जलस्रोत से ठंडा और गर्म दोनो पानी निकलता है। चौथी खासियत है इस पानी का औषधीय गुण। जो पेट और चर्म रोग के लिए काफी लाभदायक है।
कुआं के निर्माण में चकोर वाले साइज की ईंट और पत्थर का इस्तमाल किया गया है।
यह कुआं अपनी मजबूती के लिए भी जाना जाता है।
इस कुआं की गहराई 150 फीट है जो उस समय के लिए बड़ी बात थीं क्योकिं उस समय पानी 20 फीट की गहराई पर ही मिल जाता था। इस मौर्यकालीन कुआं के बारे में कहा जाता है की इसका जल जीवन औषधि की तरह है। एक जमाने में यहां मौजूद बौद्ध लामा इस जल का इस्तेमाल बीमारी को ठीक करने में भी करते थे।
मौर्य काल में ‘हीलिंग’ (बीमारियों को ठीक करने वाले) कुएं और स्पा लोकप्रिय थे। माना जाता था कि लगमा गांव के इस कुआं से 19 ज्ञात बीमारियों को ठीक करने के लिए उपचार गुणों वाला पानी है।
यहां आसपास रहने वाले बौद्ध लामा आंखों के रोगों को ठीक करने के लिए इस कूआं के पाने का इस्तेमाल करते थे। गांव के बुजुर्ग नंदकेश्वर पासवान कहते हैं कि इस कुएं ने एक महिला को हिस्टेरिकल दौरे से ठीक कर दिया था।
लामा से ही लगमा गांव बना है। इस गांव में बौद्ध लामा के प्राचीन देवी – देवता चंडरोषन, ब्रजयोगिनी और बौद्धदेवी बसुधरा की अतिप्राचीन मूर्ति है। जिसका सीधा संबंध तिब्बत से है।
प्रसिद्ध इतिहासकार राजेंद्र प्रसाद सिंह के मुताबिक पानी को तरसते आर्य कुँए का आविष्कार नहीं कर पाए थे। बरसा के पानी पर जिंदा थे और वे बरसा के देवता इंद्र को पूजते थे।जब वे भारत आए, तब उनको आश्चर्य हुआ। अरे ! यहाँ तो कुँए में भी पानी है। बरसा के देवता इंद्र तो धरती पर उतरकर कुँए में भी बसते हैं। बस, उन्होंने कुँए का नाम ” इंद्रागार ” ( इंद्र का खजाना ) रख दिया।आज इंद्रागार ही इँदारा या इनारा या इनार है।
लगमा गांव का यह इनारा अपनी बहुत सारी खासियत की वजह से अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है।
मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता में कुआं कुछ इसी तरह के होते थे। इस कुआं के आसपास प्राचीन काले ग्रेनाइट की खंडित अवस्था में तथागत बुद्ध की प्राचीन मूर्ति रखी हुई है। आसपास खुदाई होने पर बुद्ध की प्राचीन मूर्ति बड़े पैमाने पर निकलती रही है। इसी गांव में बुद्धकालीन प्रतिमा को लतखोरबा गोसाई मानकर जूते और चप्पल से पीटे जाने की एक परंपरा बनाकर साजिश रची थी। लेकिन, अब लोगों में बौद्धिक जागृति आने के बाद साजिश युक्त परंपरा बंद कर दी गई है।
इस गांव में नाले या नए घर के निर्माण के वक्त मौर्यकालीन ईंट, बर्तन और सिक्के मिलना आम बात है।

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