कोरोना महामारी का तांडव  

संपादकीय : रणविजय सिंह            

  • यह कहने में कहीं से भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि काफी हद तक कुंभ का आयोजन इसके लिए जिम्मेदार है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट कहा कि सांकेतिक स्नान किया जाए। कुछ अखाड़ों ने तो प्रधानमंत्री की बात का मान रखा लेकिन कई अखाड़े तो उग्र हो गए…  

 कोरोना संक्रमण से पूरा देश कराह रहा है। लोग मर रहे हैं। महामारी ने पूरे देश को इस तरह से जकड़ लिया है कि अस्पतालों की व्यवस्थाएं भी चरमरा गई हैं। सरकारी अस्पताल हों या फिर निजी, कहीं भी कोरोना संक्रमितों को बेड उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। आक्सीजन सिलेंडर के तो दर्शन ही दुर्लभ हैं। इन अव्यवस्थाओं के बीच लाखों लोग जिन्दगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं। लोगों को पता नहीं कि कब क्या हो जाए। अगली सुबह परिजनों या फिर सगे संबंधियों से मुलाकात हो या नहीं।

दरअसल, कोरोना को लेकर लापरवाही सरकारी स्तर पर तो हुई ही है, लेकिन आम जनमानस भी कोरोनाविस्फोट के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। उत्तराखंड को ही देख लीजिए। यह कहने में कहीं से भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि काफी हद तक कुंभ का आयोजन इसके लिए जिम्मेदार है। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्पष्ट कहा कि सांकेतिक स्नान किया जाए। कुछ अखाड़ों ने तो प्रधानमंत्री की बात का मान रखा लेकिन कई अखाड़े तो उग्र हो गए। ठीक है, महा कुम्भ रोज-रोज नहीं आता, लेकिनसाधु संतों को भी समझना चाहिए कि कोरोना की वजह से न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरा देश परेशान हैं। आस्था रखना अच्छी बात है। होनी भी चाहिए। लेकिन हालात को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। उम्मीद तो जताई जा रही थी कि प्रधानमंत्री के संदेश के बाद उत्तराखंड सरकार भी सख्त कदम उठाएगी, पर सरकार भी चुपचाप मौनी बाबा बनी रही।

लाखों की संख्या में साधु-संतों ने कुंभ में पवित्र डुबकी लगाई लेकिन इनमें से ही कुछ संक्रमित भी पाये गये हैं। कुंभ के लिए जारी गाइडलाइन का पालन कराना सरकार खासकर मेला प्रशासन की जिम्मेदारी थी। लेकिन गाइडलाइन की धज्जियां उड़ाई गईं। सरकारी आदेश के मुताबिक नदी के अंदर 20 मिनट से ज्यादा कोई भी श्रद्धालु स्नान नहीं कर सकता। पर गाइडलाइन की अनदेखी की गई। सरकार सख्त होती तो हालात कुछ तो कंट्रोल में होते। पर ढिलाई बरती गई जिसका परिणाम यह हुआ कि आज सरकारी और गैर-सरकारी दोनों ही अस्पतालों में बेड उपलब्ध नहीं हैं। बेड मिल भी गए तो आक्सीजन नहीं है। जीवन रक्षक दवाइयां बाजार से गायब हैं।

सरकार को पता है कि महामारी रोकने के लिए स्वास्थ्य सेवाएं उत्तराखंड में कारगर नहीं हैं। फिर भी सरकार सख्त नहीं हुई। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को सुधारने की जिम्मेदारी सरकार की है। हालांकि, यह तुरंत किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है।स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। राज्य बने करीब 20 साल हो गए हैं लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं आज भी लचर हैं। इस पर किसी भी सरकारों ने कसरत तक नहीं किया है। जबकि उत्तराखंड आपदा के लिहाज से काफी संवेदनशील है। भूकंप और भूस्खलन तो यहां आम बात है। बड़े-बड़े भूकंप यहां आते रहेहैं। यदि वाकई सरकारों में इच्छा शक्ति होती तो नये अस्पताल बनते।

यहां तो हालत यह है कि पहले के बने अस्पताल ही दम तोड़ रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का घनघोर अभाव है। आज यदि स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर होंती तो कोरोना काल में यूं बेड और आक्सीजन की दिक्कत उत्तराखंड में नहीं होती। पर दुर्भाग्य यह है कि स्वास्थ्य सेवाएं बदतर स्थिति में हैं। केवल कागजों पर ही स्वास्थ्य सेवाएं उत्तम दिख रही हैं। जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है। हां,यह भी सच है कि केवल सरकार को कोसने से काम नहीं चलने वाला है। इस महामारी केदौर में आम आदमी को भी जागरूक होना होगा। दुखद स्थिति यह है कि सरकार बारबार चेतावनी दे रही है, उसके बावजूद संक्रमण तेजी के साथ बढ़ रहा है। इसलिए मास्क और दो गज की दूरी का पालन करें। पर ऐसा नहीं हो रहा। ज्यादातर युवा मास्क नहीं पहन रहे हैं। हालांकि, इसका खमियाजा भी युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। अब भी वक्त है। लोगों को संभल कर काम करना चाहिए। कोरोना की गाइडलाइन का पालन सभी को करना चाहिए। वरना अनहोनी को टालना मुश्किल है। इसलिए महज सरकार को कोसने से भी काम नहीं चलेगा। खुद को भी सतर्क रखना होगा। तभी जाकर कोरोना संक्रमण पर काबू पाने में कामयाबी मिल सकती है।

-रणविजय सिंह         

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