उत्तराखंड के धधकते जंगलों पर ‘नासा’ के उपग्रह की नजर

मैदान से लेकर पहाड़ तक धू—धू जल रहे जंगल
रिहायशी इलाकों में भी पहुंची लपटें
समय रहते मशीनरी मुस्तैद हो जाती तो काफी हद तक पा लिया जाता काबू
यूसैक के विशेषज्ञों ने मोडिस सी—6 उपग्रह की मदद से एकत्र किए डाटा 
देहरादून । उत्तराखंड का आधे से अधिक हिस्सा दावानल (वनाग्नि) की चपेट में है। मैदान से लेकर पहाड़ तक जंगल धू—धू कर जल रहे हैं, पर आग पर काबू पाने में सिस्टम लाचार साबित हो रहा है। शुक्र इतना की केंद्र सरकार से जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए दो हेलीकाप्टर राज्य को मिल गए हैं। वायुसेना के इन दो ‘एमआई-17 हेलीकाप्टर’ ने सोमवार सुबह से गढ़वाल व कुमाऊं मंडल में अपना काम करना शुरू भी कर दिया है। वहीं अब इंदेव की मेहरबानी पर भी सभी की टकटकी लगी हुई है। क्योंकि मौसम विभाग ने अगले एकाध दिन में राज्य के अधिकांश स्थानों पर बारिश होने का पूर्वानुमान जारी किया है। हल्की से मध्यम गति की बारिश हुई तो मुमकिन है कि जंगलों में लगी आग पर काफी हद तक काबू पा लिया जाएगा।
लेकिन एक बात यहां गौर करने वाली है कि वन महकमा व अन्य सरकारी मशीनरी यदि समय रहते मुस्तैद हो जाती तो वनाग्नि को यद्यपि पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता, पर इससे होने वाले नुकसान को कम जरूर किया जा सकता था। लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा हुआ नहीं। अब स्थिति यह कि पहाड़ में दिन—रात जंगल धू—धू जल रहे हैं और वातावरण धुंध पसरी हुई है। सूबे का वन महकमा खुद मान चुका है कि बीती एक अक्टूबर से चार अप्रैल तक वनों में आग लगने की एक हजार घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिससे करीब 1400 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ है। इससे चालीस लाख की वन संपदा को नुकसान होने का आकलन भी किया गया है। जबकि हकीकत यह कि वनाग्नि का असर इससे अधिक रहा है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) की वैज्ञानिक नीलम रावत व अन्य विशेषज्ञों ने नासा के ‘मोडिस सी—6’ उपग्रह की मदद से प्रदेश के अलग—अलग हिस्सों में वनाग्नि की सेटेलाइट इमेज प्राप्त कर जो तथ्य सामने रखे हैं वह बेहद चौकाने वाले हैं। तेरह में से ऐसा कोई जिला नहीं है जहां पर जंगलों में आग लगने की घटना सामने न आई हो।
अंतरिक्ष केंद्र ने बीती 15 मार्च से पांच अप्रैल तक का जो डाटा लिया है उसके अनुसार राज्य में इस दौरान वनाग्नि की 1१८7 घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें भी 15 मार्च से 3१ मार्च तक 5८ घटनाएं और एक अप्रैल से पांच अप्रैल तक 679 घटनाएं सामने आई हैं। यानी इन बीस दिनों में ही हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र दावानल की चपेट में आ चुका है, जो अब कई जगह रिहायशी इलाकों तक भी पहुंच गया है। पिछले पांच दिनों की बात करें तो नैनीताल सबसे अधिक प्रभावित जिला रहा है। इस दौरान यहां पर वनाग्नि की 16५ घटनाएं सामने आई हैं। पौड़ी में भी 152 घटनाएं इस दौरान सामने आ चुकी हैं। इसके अलावा टिहरी में 92, अल्मोड़ा में 71, चमोली में 50 व चंपावत में 46 जगह जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं।

वन विभाग के लिए डाटा मददगार: प्रो. बिष्ट

 उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट के मुताबिक नासा के उपग्रह (मोडिस सी—6) की मदद से यूसैक को रोजाना सेटेलाइट इमेज प्राप्त होती है। इन उपग्रहीय तस्वीरों से देखा जा सकता है कि राज्य में किन—किन स्थानों पर जंगलों में आग लगी हुई है। इन तस्वीरों से वनाग्नि प्रभावित क्षेत्र का सटीक डाटा मिलता है। वन विभाग चाहिए तो इस डाटा की मदद से वनाग्नि को और अधिक क्षेत्र फैलने से रोक तो सकता ही, साथ ही प्रभावित क्षेत्र में तुरंत आग पर काबू भी किया जा सकता है। प्रोफेसर बिष्ट के मुताबिक केंद्र द्वारा बीती पंद्रह मार्च से ही नियमित रूप से शासन को यह आंकड़े प्रेषित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यही कि संबंधित एजेंसियां (विभाग) समन्वय बनाकर दावानल जैसी घटनाओ को रोक सकें।

आकलन के लिए विभाग लगाता ‘अंदाजा’

वन महकमा वनाग्नि की रोकथाम के लिए हर साल कार्ययोजना तो तैयार करता है, परंतु फायर सीजन में परिणाम हर मर्तबा इसके उलट आते हैं। जानकार इसका कारण कहीं न कहीं महकमे की लापरवाही मानते हैं। क्योंकि जंगलों की आग रोकने के लिए जो महकमे द्वारा जो कार्ययोजना तैयार की जाती है वह अक्सर फाइलों में ही कैद होकर रह जाती है। फील्ड स्टाफ के पास भी आग लगने की सूचना तब प्राप्त होती है जबकि कई हेक्टेयर जंगल आग की लपटों में राख हो जाता है। वन विभाग के कर्मचारियों के पास इतने उम्दा संसाधन मौजूद नहीं कि जंगल में लगी भयावह आग पर काबू पाया जा सके। ऐस में आग बुझाने के लिए या तो पारंपरिक तौर-तरीके अपनाने पड़ते हैं या फिर केंद्र से मिलने वाली मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन तब तक करोड़ों की वन संपदा खाक हो जाती है और अनगिनत बेजुबान वन्यजीव आग की लपटों में समा जाते हैं। जिसका आकलन वन विभाग द्वारा बाद में ‘अंदाजा’ लगाकर किया जाता है।

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