हिमालय सूना क्यों है? 40 साल बाद उत्तराखंड में बिना बर्फ की सर्दी ने बढ़ाई चिंता

उत्तराखंड में इस बार सर्दियों का मंजर बिल्कुल बदला हुआ नजर आ रहा है। जनवरी का आधा महीना बीत जाने के बावजूद हिमालय की ऊंची चोटियों पर बर्फबारी नहीं हुई है। रुद्रप्रयाग स्थित तुंगनाथ की ऊंची पहाड़ियों से लेकर नैनीताल और मसूरी जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तक बर्फ का नामोनिशान नहीं है। हैरानी की बात यह है कि 15 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित गूंजी की पहाड़ियों पर भी हिमपात नहीं हुआ। ऐसा 1985 के बाद पहली बार देखा जा रहा है, जिसने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है।

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीरों में केदारनाथ और बद्रीनाथ की पहाड़ियां भी सूखी दिखाई दे रही हैं। इसका सीधा संकेत है कि इस बार पूरा उत्तराखंड लगभग हिमपात रहित रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह ग्लोबल वार्मिंग और मौसम के पैटर्न में बदलाव है। साथ ही सर्दियों में बनने वाले पश्चिमी विक्षोभों की कमी भी एक बड़ा कारण मानी जा रही है। आमतौर पर चार से पांच पश्चिमी विक्षोभ बनने से बारिश और बर्फबारी होती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

बर्फबारी न होने का असर अब जंगलों पर भी दिखने लगा है। नंदा देवी क्षेत्र के घने जंगलों में सर्दियों के मौसम में भी आगजनी की घटनाएं सामने आ रही हैं, जो पहले बेहद दुर्लभ थीं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही हाल रहा तो हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे, जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में कृत्रिम झीलों का निर्माण होगा और उनके टूटने से भीषण आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा।

हिमालय पर कम होती बर्फबारी केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है। इसका असर मैदानी इलाकों में बाढ़, सूखे और कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग एक वैश्विक समस्या है, जिसमें विकसित देशों की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन समाधान के लिए सभी देशों को मिलकर आगे आना होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ हमें स्थानीय स्तर पर भी ठोस कदम उठाने होंगे। पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण, खनन और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर तत्काल रोक जरूरी है। विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ बंद करनी होगी, तभी हिमालय और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।

 

 

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