धराली आपदा की आंखों देखी कहानी: जब विनाश के बीच उम्मीद के दीप जलते रहे

देहरादून: दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में  आयोजित “आँखन देखी कार्यक्रम” में उत्तराखंड हिमालय की धराली आपदा से जुड़ी हृदयविदारक कहानियों और राहत कार्यों में लगे कर्मवीरों के अनुभवों को साझा किया गया। यह आयोजन भारत ज्ञान विज्ञान समिति, उत्तराखंड के सहयोग से हुआ, जिसमें धराली सहित उत्तरकाशी क्षेत्र की हालिया आपदा के कारणों, प्रभावों और राहत प्रयासों पर गहन चर्चा की गई।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़े **विजय भट्ट, इंद्रेश नौटियाल** और **प्रतीक पंवार** ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने आपदा के तीन सप्ताह बाद धराली क्षेत्र का पैदल दौरा कर स्थानीय लोगों से प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की। वक्ताओं ने बताया कि **5 अगस्त 2025** को आई भयानक बाढ़ और भूस्खलन ने धराली बाजार को पूरी तरह तबाह कर दिया।

विजय भट्ट ने कहा कि “**हिमालय जितना सुंदर है, उतना ही संवेदनशील भी है**।” उन्होंने कहा कि धार्मिक यात्रा, पर्यटन और ऑल वेदर रोड जैसी परियोजनाओं ने विकास की रफ्तार तो बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ ही आपदाओं का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है। उन्होंने चेताया कि बिना पर्यावरणीय आकलन के हो रहा अंधाधुंध निर्माण हिमालय की पारिस्थितिकी को असंतुलित कर रहा है, जिससे क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिरता खतरे में है।

वक्ताओं ने कहा कि खीर गंगा क्षेत्र में आए **फ्लैश फ्लड** ने धराली का नामोनिशान मिटा दिया, वहीं हर्षिल में भी भारी नुकसान हुआ। इसके बावजूद स्थानीय लोग और कुछ कर्मवीर राहत कार्यों में दिन-रात जुटे रहे, जिन्होंने जान जोखिम में डालकर प्रभावितों तक सहायता पहुँचाई।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने पीपीटी प्रस्तुति के माध्यम से पीड़ितों की आपबीती साझा की और **यमुनोत्री मार्ग के सयाना चट्टी**, **देहरादून की सहस्रधारा**, तथा **सौंग और टौंस नदियों** से उपजी आपदाओं पर भी अपने अनुभव बताए।

चर्चा में **डॉ. रवि चोपड़ा** ने कहा कि उत्तराखंड की पर्वतीय भूगोल को ध्यान में रखे बिना विकास की दौड़ ने राज्य को आपदाओं की ओर धकेला है।
कार्यक्रम में **डॉ. पंकज नैथानी**, **अरुण असफल**, **मनीष ओली**, **उमा भट्ट**, **प्रदीप नौडियाल**, **डॉ. लालता प्रसाद**, **जगदीश बाबला**, **मोहन चौहान**, **जगदीश सिंह महर**, **योगेंद्र नेगी**, **संजय घिल्डियाल** समेत कई पर्यावरणप्रेमी, विचारक और युवा शामिल हुए।

कार्यक्रम का निष्कर्ष यह रहा कि हिमालय की संवेदनशीलता को समझते हुए विकास की दिशा तय करनी होगी, अन्यथा धराली जैसी त्रासदियां भविष्य में और गहरी होंगी।

 

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