यमुना तट पर स्थित माता कर्ण देवी मंदिर आस्था, इतिहास और अद्भुत कथा का संगम माना जाता है। उत्तर प्रदेश के औरैया-इटावा-जालौन के दुर्गम बीहड़ क्षेत्र में यह प्राचीन धाम करीब दो हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। खासकर नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माता कर्ण देवी के दरबार में आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
भीखेपुर कस्बे से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर का संबंध दानवीर राजा कर्ण से जुड़ा है। कहा जाता है कि माता कर्ण देवी की कृपा से राजा कर्ण को प्रतिदिन सवा मन सोना प्राप्त होता था, जिसे वे दीन-दुखियों और अपनी प्रजा में दान कर दिया करते थे। जनश्रुति है कि राजा कर्ण माता को प्रसन्न करने के लिए गर्म तेल में खड़े होकर पूजा-अर्चना करते थे और स्वयं को देवी को समर्पित कर देते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें यह अद्भुत वरदान दिया।
किंवदंती के अनुसार, राजा कर्ण की इस अनूठी भक्ति और दान के रहस्य को जानने के लिए उज्जैन नरेश राजा विक्रमादित्य यहां आए और नौकर के वेश में उनके साथ रहने लगे। एक दिन उन्होंने देखा कि किस प्रकार राजा कर्ण तपस्या कर प्रतिदिन सवा मन सोना पाते हैं। इसके बाद विक्रमादित्य ने छलपूर्वक कर्ण का रूप धारण कर पूजा करने का प्रयास किया, लेकिन माता ने तुरंत पहचान लिया। उन्होंने विक्रमादित्य को वर मांगने को कहा। विक्रमादित्य ने माता से आग्रह किया कि वे उज्जैन चलें, लेकिन माता ने इंकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने मूर्ति पर तलवार चला दी और उसका ऊपरी हिस्सा उज्जैन ले गए। वहीं शेष भाग आज भी यमुना तट पर विराजमान है और माता कर्ण देवी के रूप में पूजित होता है।
आज भी इस खंडित मूर्ति में आस्था बसती है और श्रद्धालु दूर-दूर से यहां दर्शन करने आते हैं। नवरात्र में तो यहां मेले और रामलीला का आयोजन होता है, जिससे मंदिर परिसर भक्ति और उल्लास से गूंज उठता है।