अरुणाचल प्रदेश में रह रहे लाख से ज्यादा चकमा-हाजोंग के पुनर्वास को ले पूर्वोत्तर में बखेड़ा

असम और दूसरे राज्यों में बसाने की हो रही बात
जातीय संगठनों ने दी चेतावनी, कहा- असम में भी लागू हो इनर लाइन परमिट
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

ईटानगर/गुवाहाटी। अरुणाचल प्रदेश में रह रहे (अनुमानित) 2 लाख चकमा-हाजोंग समुदाय के लोगों को असम सहित अन्य राज्यों में बसाने की कथित योजना ने पूर्वोत्तर भारत में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजु ने दावा किया है कि उन्होंने असम के मुख्यमंत्री और नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) के संयोजक हिमंत बिश्व सरमा से इस मुद्दे पर निवेदन किया है, ताकि इन समुदायों को अरुणाचल से बाहर बसाया जा सके। रिजिजु ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश एक पूर्ण ट्राइबल राज्य है, जहां गैर-आदिवासी समुदायों को स्थायी निवास की अनुमति नहीं दी जा सकती। ये तमाम लोग तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से 1960 के दशक में बतौर शरणार्थी बसाये गये थे।

केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजु, जो कि मूल रूप से अरुणाचल प्रदेश के निवासी हैं, ने कहा है कि उन्होंने असम के मुख्यमंत्री डॉ हिमंत बिश्व सरमा से अनुरोध किया है कि चकमा-हाजोंग समुदाय के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में मदद करें। क्योंकि वे क्षेत्र के सबसे वरिष्ठ मुख्यमंत्री के अतिरिक्त नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए)
के संयोजक भी हैं।

हालांकि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा ने रिजिजु के दावे से किनारा करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार या रिजिजु के साथ चकमा-हाजोंग को असम में बसाने को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। सरमा ने स्पष्ट किया, “मुझे नहीं पता रिजिजु ने क्या कहा, लेकिन केंद्र ने हमसे इस बारे में कोई बात नहीं की। असम में इनके पुनर्वास के लिए जमीन कहां है? न तो चकमा-हाजोंग समुदाय के लोग मुझसे मिले, न ही केंद्र ने इस पर कोई बात की।” उन्होंने कहा कि वह चुनाव के बाद रिजिजु से इस मुद्दे पर बात करेंगे।

रिजिजु के बयान के बाद असम में तीखी प्रतिक्रियाएं हुई हैं। असम जातीयतावादी छात्र परिषद (एजेवायसीपी), ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू), और रायजोर दल जैसे संगठनों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। एजेवायसीपी के अध्यक्ष पलाश चांग्माई ने कहा है कि, “असम को विदेशियों का डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने दिया जाएगा। हम इस साजिश का पुरजोर विरोध करेंगे।” असम जातीयतावादी छात्र परिषद ने चेतावनी दी है कि किसी कीमत पर असम में चकमा -हाजोंग को बसाने नहीं दिया जायेगा। असम के भूमिपुत्रों की रक्षा के लिये यहां भी इनर लाइन परमिट व्यवस्था फौरन लागू होनी चाहिए।
रायजोर दल के अध्यक्ष और विधायक अखिल गोगोई ने मांग की कि अगर रिजिजु का दावा गलत है, तो सरमा को उनसे सार्वजनिक माफी मांगने के लिए कहना चाहिए।

उधर, चकमा डेवलपमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (सीडीएसआई) ने किसी पुनर्वास योजना को खारिज करते हुए इसे जातीय भेदभाव करार दिया। संगठन के संस्थापक सुहास चकमा के मुताबिक, “अरुणाचल प्रदेश में 94% चकमा और हाजोंग भारतीय नागरिक हैं। उन्हें जबरन हटाना 1996 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन होगा।”

पृष्ठभूमि और विवाद:
चकमा (मुख्य रूप से बौद्ध) और हाजोंग (हिंदू) समुदाय 1964-66 के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के चटगांव हिल ट्रैक्ट्स से धार्मिक उत्पीड़न और कप्तई बांध के कारण विस्थापन के चलते भारत आए थे। उन्हें तत्कालीन नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा), जो अब अरुणाचल प्रदेश है, में बसाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 और 2015 में इन समुदायों को नागरिकता देने का निर्देश दिया था, लेकिन अरुणाचल प्रदेश सरकार ने इसे लागू नहीं किया।

जनवरी 2020 के आंकड़े के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में चकमा और हाजोंग समुदाय के लोगों की कुल संख्या 65,875 थी, जिनमें से 60,500 लोगों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जन्म से नागरिक माना जाता है। हालांकि, गैर सरकारी दावों के अनुसार इस समय यह संख्या दो लाख तक हो सकती है। इस समय लगभग सभी लोग राज्य में पैदा हुए हैं, इसलिए उन पर बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन-1873 लागू नहीं होता।

इनर लाइन परमिट की मांग:

कई संगठन असम में भी इनर लाइन परमिट (आईएलपी) व्यवस्था लागू करने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में यह व्यवस्था अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर में लागू है। उनका तर्क है कि आईएलपी से असम की स्वदेशी पहचान और संसाधनों की रक्षा होगी।

कुल मिलाकर चकमा-हाजोंग पुनर्वास का मुद्दा पूर्वोत्तर में आने वाले समय के लिये एक जटिल और संवेदनशील विषय बन गया है। केंद्र सरकार इस मामले को कैसे सुलझाएगी, देखना होगा।

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