विश्वबन्धुत्व दिवस 25 अगस्त पर : रक्तदान के रूप दादी प्रकाशमणि को अनूठी श्रद्धांजलि

डा.  श्रीगोपालनारसन एडवोकेट


राजयोगिनी ध्यानयोगिनी
दादी प्रकाशमणि तुम हो
दिव्य व्यक्तित्व तुम्हारा था
शिव परमात्मा की बेटी तुम हो
ब्रह्माकुमारीज को आगे बढाया
दुनियाभर में अध्यात्म छाया
चरित्र निर्माण की पोषक रही
विश्व शांति की संवाहक रही
कभी तुम रमा कहलाती थी
ओम मंडली में रोज़ आती थी
ब्रह्माबाबा का सानीदय मिला
अंतर्मन को ज्ञान प्रकाश मिला
तभी तो प्रकाशमणि कहलाई
ब्रह्माकुमारीज चीफ बनकर छाई।
दादी प्रकाशमणि का स्मृति दिवस इस बार कुछ अनूठे ढंग से मनाया जा रहा है।उनकी स्मृति को चिर स्थाई रखने के लिए 22 अगस्त से 25 अगस्त तक देशभर में रक्तदान शिविरों का आयोजन किया गया है,जो दादी के परोपकार के संदेश को पुष्ट करता है।प्रजापिता ब्रहमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविधालय का प्रकाश देश विदेश में पहुंचाने और विश्वविधालय के सेवा केन्द्रों का विस्तार दुनिया के 140 देशों में साढे आठ हजार की संख्या तक करने का श्रेय अगर परमात्मा के बाद किसी को जाता है तो वह ब्रह्माकुमारीज् संस्था की मुख्यप्रशासिका रही दादी प्रकाशमणि है। आध्यात्म के रास्ते राजयोग के माध्यम से सीधे परमात्मा शिव का बोध कराने वाली इस सस्ंथा ने दुनिया से विकारों को दूर करने तथा पावन पवित्र बनने का ऐसा अभियान चलाया कि सस्ंथा में जो साधक सख्ंया 400 तक थी,वह आज लाखों में है। जिसके लिए दादी प्रकाशमणि का कुशल नेतृत्व ही सफलता का कारक रहा है। दादी प्रकाशमणि कही कुशल प्रशासक नजर आती तो कही प्यार की मूरत के रूप में सबको प्यार का सन्देश दे रही होती।दिव्य गुणों की खान प्रकाशमणि का व्यक्तित्व चुम्बकीय था यानि जो भी एक बार दादी के सम्र्पक में आ जाता तो उनका मुरीद हो जाता। सभी को उमंग ,उत्साह,सीख और आगे बढने की प्रेरणा देने वाली दादी प्रकाशमणि ब्रहमाकुमारीज मिशन के प्रमुख पद पर रहते हुए भी एक आम इंसान की तरह थी और स्वयं को शिव बाबा का टृस्टी समझकर बडी से बडी समस्या का हल मिनटो में निकाल देती थी। उन्हे विश्व एकता की की संवाहक माना जाए तो गलत नही होगा।
दिव्य विभूति दादी प्रकाशमणि का जन्म एक जून सन 1922 को पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त अन्तर्गत हैदराबाद में हुआ था। जब सन 1937 में उस समय के प्रसिद्ध हीरा व्यापारी एवं जाने माने सेठ दादा लेखराज को परमात्मा के सत्य स्वरूप व भावी नई दुनिया का अलौकिक साक्षात्कार हुआ और उन्होने अपनी सारी सम्पत्ति बल्र्ड रिन्यूवल टृस्ट का निर्माण कर नई दुनिया की स्थापना के लिए उसमें निहीत कर दी। वही मात्र 14 वर्ष की आयु में रमा देवी नामक बालिका ने दादा लेखराज के प्रति पुत्रीवत समर्पण करके अलौकिक ईश्वरीय ज्ञान रूपी यज्ञ में आहुति डालने का काम किया।जिससे उन्हे भी ज्योति स्वरूप शिव व नई सतयुगी दुनिया के साक्षात्कार हुए और वे रमा देवी से प्रकाशमणि बन गई।
हर किसी का मधुर मुस्कान से स्वागत कर दिल जीत लेने वाली कर्मयोगिनी प्रकाशमणि की पवित्रता और सरलता के सभी कायल थे। उन्होने जीवनभर प्यार की सौगात दी और जीवन जीने की कला जनसामान्य को सिखायी। प्रजापिता ब्रहमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविधालय को पांच द्वीपों तक फैलाने में दादी प्रकाशमणि का अहम योगदान है। जिनके नेतृत्व में सस्ंथा ने देश विदेश में तरक्की की और मधुबन का इतना विस्तार किया कि आज माउन्ट आबू की पहचान ही मधुबन यानि बाबा का धर से होने लगी है। चाहे शान्ति वन का विशाल परिसर हो और उसमें स्थित 20 हजार व्यक्तियों की क्षमता का डायमण्ड सभागार अथवा उसी परिसर में 35 हजार से 50 हजार तक के व्यक्तियों की भोजन निर्माण व्यवस्था की नई प्रदुषण रहित कीचन या फिर मनमोहिनी भवन,रेडियों मधुबन,पीस आफ माइण्ड चैनल,गाडली वुड फिल्म स्टूडियों ,ज्ञानामृत एवं ओम शान्ति मीडिया समाचार पत्र,ज्ञान सरोवर,पाण्डव भवन,यूनिवर्सल सभागार, पीस पार्क का आधुनिकीकरण सबकुछ दादी प्रकाशमणि की दूरदर्शिता ,कुशल नेतृत्व व कर्मशीलता की देन है। लेकिन फिर भी दादी प्रकाशमणि एक आम इसांन ही बनी रही और परमात्मा शिव व ब्रहमा बाबा की टृस्टी बनकर संस्था में चार चांद लगाती रही।
जहां पडे कदम वही सफलता का इतिहास लिख देने वाली प्रकाशमणि विनम्रता की प्रतिमूर्ति थी,गुणों की खान थी,अनुभव की निधि थी और फरिश्ता समान होकर सबके दुख हर लेने वाली देवी थी। आत्म विश्वास से लबरेज दादी प्रकाशमणि ने कथनी और करनी में समानता रखी और सत्यता की शक्ति से एकता की सूत्रधार बनकर दुनिया भर को शान्ति,सुख और सर्वगुण सम्पन्नता की राह दिखाई।तभी तो उन्हे अन्तराष्टृीय शान्तिदूत होने का सम्मान हासिल हुआ। दादी प्रकाशमणि ऐसी आध्यात्म ज्ञान की विभूति थी जिन्होने देशविदेश में बडी से बडी हस्ती को ईश्वरीय ज्ञान दिया और परमात्मा की सत्ता का बोध उन्हे कराया। तभी तो पाश्चात्य सभ्यता को छोडकर अनेक देशी विदेशी भाई बहन न सिर्फ विकारो को त्यागकर शिव बाबा के ज्ञान में आये बल्कि पावन व पवित्र बनकर दुनिया में बदलाव का सन्देश दिया। तभी तो दादी प्रकाशमणि को आध्यात्म ज्ञान का ज्योतिपूंज माना जाता है। जो शरीर छोड देने के बाद भी आत्मस्वरूप में दुनिया को प्रकाशमान किये हुए है। इसीलिए वे रमादेवी के बजाए प्रकाशमणि कहलाती है।25 अगस्त सन 2007 में दादी प्रकाशमणि ने माउन्ट आबू में ही अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया और परमात्मा के पास जाकर आत्म स्वरूप में लीन हो गई। तभी से ब्रहमाकुमारीज परिवार दुनियाभर में दादी प्रकाशमणि के शरीर मुक्ति दिवस को विश्व बन्धुत्व दिवस के रूप में मनाता है।ऐसी महान दिव्य विभूति दादी प्रकाशमणि को उनके स्मृति दिवस यानि विश्व बन्धुत्व दिवस पर शत शत नमन।(लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार है)

डा0 श्रीगोपालनारसन एडवोकेट

पो0 बा0 81,मकान नम्बर 1043,गीतांजलि विहार,रूडकी,उत्तराखण्ड

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