प्रस्तुति- सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है, जहां इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष ने क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों को सतर्क कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयानों और सैन्य तैनाती ने इस आशंका को बल दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर सकता है।
रूस, तुर्की और अन्य देशों की प्रतिक्रियाएं इस स्थिति को और जटिल बना रही हैं। भारत सहित कई देश इस संकट के वैश्विक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इज़राइल के हमलों का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें हमलों की पूरी जानकारी थी और ईरान को परमाणु समझौते के लिए 60 दिन का अल्टीमेटम दिया गया था, जो 13 जून को समाप्त हुआ। ट्रम्प ने 18 जून को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई को “बिना शर्त आत्मसमर्पण” करने की चेतावनी दी, यह कहते हुए कि अमेरिका को खामनेई के ठिकाने का पता है और उसके पास ईरान के हवाई क्षेत्र पर नियंत्रण है।
अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है। यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और यूएसएस अब्राहम लिंकन जैसे विमानवाहक पोत फारस की खाड़ी और लाल सागर में तैनात किए गए हैं। डिएगो गार्सिया द्वीप पर बी-52 बमवर्षक विमानों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त एफ-15 जेट भेजे गए हैं। इन कदमों को ट्रम्प की “अधिकतम दबाव” नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है।
हालांकि, ट्रम्प ने कूटनीतिक समाधान की संभावना को भी खुला रखा है। उन्होंने कहा कि वह शांति वार्ता के लिए मध्य पूर्व की यात्रा करने के बजाय टेलीफोन के माध्यम से बातचीत करेंगे। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की योजना को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है, लेकिन अंतिम फैसला ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर उसकी प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान ने अमेरिका और इज़राइल को कड़ी चेतावनी दी है। सर्वोच्च नेता खामनेई ने कहा कि इज़राइल को उसके हमलों की “सजा” दी जाएगी और अमेरिका की भागीदारी से क्षेत्र में “अपूर्व क्षति” होगी। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका पर इज़राइल की आक्रामकता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और कहा कि परमाणु वार्ता के लिए इज़राइल की कार्रवाइयां रुकनी चाहिए। ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, जैसे कतर, यूएई और बहरीन में मौजूद बेस, को निशाना बनाने की धमकी दी है।
ईरान ने इज़राइल पर अपनी मिसाइल क्षमता का प्रदर्शन किया है, जिसमें 2,000 किमी रेंज वाली सेजिल मिसाइल शामिल है। ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि उन्होंने इज़राइल में मोसाद के एक केंद्र पर हमला किया। हालांकि, इज़राइल ने इन दावों को खारिज किया है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रतिक्रियाएं
रूस: राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इज़राइल के हमलों की निंदा की और चेतावनी दी कि अमेरिका की भागीदारी मध्य पूर्व को अस्थिर कर देगी। पुतिन ने ट्रम्प के साथ 50 मिनट की फोन बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की। रूस ने ईरान को एस-300 वायु रक्षा प्रणाली प्रदान की है और क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
तुर्की: राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इज़राइल की कार्रवाइयों को “धोखेबाजी” बताया और क्षेत्र में शरणार्थी संकट की आशंका जताई। तुर्की ने मध्यस्थता की पेशकश की, लेकिन इज़राइल के साथ उसके तनावपूर्ण संबंध इस प्रयास को सीमित कर सकते हैं।
चीन: चीन ने ईरान के साथ अपने आर्थिक हितों, जैसे 400 अरब डॉलर के ऊर्जा समझौते, को देखते हुए संयम बरतने की अपील की। उसने अपने नागरिकों को इज़राइल छोड़ने की सलाह दी है।
पाकिस्तान: पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर की ट्रम्प के साथ मुलाकात ने अटकलों को जन्म दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ रणनीति में पाकिस्तान की मदद ले सकता है। हालांकि, पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से ईरान का समर्थन किया है, जिससे उसकी दोहरी नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
भारत की स्थिति
भारत ने इज़राइल और ईरान के बीच तनाव पर चिंता जताई है और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। भारत के लिए यह स्थिति जटिल है, क्योंकि उसके इज़राइल और ईरान दोनों के साथ रणनीतिक संबंध हैं। इज़राइल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार है, जबकि ईरान चाबहार बंदरगाह परियोजना और तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है। भारत ने अपने नागरिकों को मध्य पूर्व छोड़ने की सलाह दी है और “ऑपरेशन सिंधु” शुरू किया है, जिसके तहत तेहरान से भारतीयों को निकाला जा रहा है।
इस संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 7% की वृद्धि हुई है, और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने की आशंका है। भारत, जो अपनी 80% तेल आवश्यकताओं के लिए फारस की खाड़ी पर निर्भर है, वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प की आक्रामक बयानबाजी और सैन्य तैनाती ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। उनका प्राथमिक लक्ष्य ईरान को परमाणु वार्ता की मेज पर लाना हो सकता है। हालांकि, यदि ईरान अमेरिकी हितों पर हमला करता है, जैसे क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर, तो सीमित सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है।
वैश्विक स्तर पर, एक पूर्ण युद्ध की संभावना कम है, क्योंकि इसके परिणाम—जैसे तेल की कीमतों में भारी उछाल, शरणार्थी संकट, और वैश्विक आर्थिक मंदी—सभी पक्षों के लिए हानिकारक होंगे। रूस और तुर्की की मध्यस्थता की पेशकश कूटनीतिक समाधान की ओर इशारा करती है, लेकिन इसकी सफलता अमेरिका और ईरान की इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी।
अगले 24-48 घंटे इस संकट के लिए निर्णायक हो सकते हैं। यदि ईरान जवाबी हमले तेज करता है या अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करता है, तो क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक स्तर पर फैल सकता है। दूसरी ओर, यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं, तो तनाव कम हो सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए सतर्क रहना होगा।