संकरी घाटियों से होकर गुजरती हैं हेलिकॉप्टर उड़ानें, केदारनाथ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में बनी रहती है दुर्घटना की आशंका
रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के चारधाम क्षेत्रों में हेलिकॉप्टर सेवाओं ने बीते वर्षों में काफी गति पकड़ी है। विशेष रूप से केदारनाथ जैसे दुर्गम स्थलों तक तीर्थयात्रियों की आसान पहुँच के लिए हवाई कनेक्टिविटी एक प्रमुख सहारा बन चुकी है। हालांकि, सुरक्षा मानकों के लिहाज़ से अभी भी कई गंभीर खामियाँ बनी हुई हैं। प्रदेश में बढ़ती हवाई आवाजाही के बावजूद अभी तक एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) सिस्टम जैसी महत्वपूर्ण सुविधा की स्थापना नहीं हो पाई है।
चारधाम यात्रा मार्गों में शामिल केदारनाथ के लिए हेलिकॉप्टर सेवाएं गौरीकुंड से संचालित होती हैं, जहां से हेलिकॉप्टर एक वी-आकार की संकरी घाटी से होकर गुजरते हैं। यह मार्ग भौगोलिक रूप से जटिल और खतरनाक माना जाता है। हर दिन लगभग नौ हेलिकॉप्टर 220 से अधिक शटल उड़ानें भरते हैं। बावजूद इसके, यहां कोई एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर नहीं है जो पायलटों को मौसम, हवा की दिशा और दबाव जैसी आवश्यक सूचनाएं प्रदान कर सके।
जून 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा के बाद राज्य सरकार और निजी कंपनियों ने हेलिकॉप्टर सेवाएं शुरू की थीं, जो आज रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं। श्रीनगर, पौड़ी, देहरादून, यमुनोत्री, गंगोत्री और कुमाऊं क्षेत्र के कई इलाकों में भी ये सेवाएं जारी हैं। इन सभी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति कठिन है—सघन वन, पहाड़ी मोड़, और तेजी से बदलता मौसम पायलटों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होता है।
हेलिकॉप्टर उड़ान के दौरान पायलट को हवा की दिशा और वेग का अंदाजा लगाकर ही ऊंचाई और गति नियंत्रित करनी पड़ती है। केदारनाथ में पायलट अक्सर लाल रंग की झाड़ियों के हिलने से हवा की दिशा का अनुमान लगाते हैं। यह तकनीक बेहद असुरक्षित मानी जाती है और किसी भी आधुनिक हवाई सेवा के मानकों पर खरी नहीं उतरती।
एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम की अनुपस्थिति न केवल यात्रियों बल्कि पायलटों की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस प्रकार की तकनीकी व्यवस्था से मौसम, तापमान, हवा की गति और दिशा की सटीक जानकारी तुरंत मिल सकती है, जिससे किसी भी संभावित दुर्घटना को रोका जा सकता है।
अफसोस की बात यह है कि केदारनाथ सहित पूरे पर्वतीय क्षेत्र में अब तक एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर स्थापित नहीं किए गए हैं। उत्तराखंड सिविल एविएशन डेवलपमेंट अथॉरिटी (UCADA) और राज्य सरकार की ओर से भी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई है। सुरक्षा की दृष्टि से यह एक गंभीर चूक मानी जा रही है।