गोपाल नारसन एडवोकेट
भले ही उत्तराखंड में स्वतंत्रता सेनानियों के उत्तराधिकारियों को सम्मान पेंशन मिलती हो और रोडवेज बस सेवा में भी वे निशुल्क यात्रा के हकदार हो लेकिन हरिद्वार जनपद के एक मात्र शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के वंशजो को उक्त सुविधाएं तो दूर उन्हें उत्तराधिकारी होने का सम्मान तक भी नही मिल पाया है।जिस समय 14 अगस्त सन 1942 को जगदीश वत्स की शहादत हुई और उसके अगले बरस पुत्र खो देने के वियोग में जगदीश वत्स की मां जमुना देवी व पिता पंडित कदम सिंह शर्मा ने अपने शरीर त्याग दिए ,उस समय यानि सन 1943 में इस परिवार में जगदीश वत्स की बहन 15 वर्षीया प्रकाशवती सबसे बड़ी थी,साथ ही 13 वर्षीया चंद्रकला,10 वर्षीया सुरेश देवी व 5वर्षीय सुरेश दत्त वत्स जगदीश वत्स के उत्तराधिकारी थे,लेकिन न तो अमर शहीद जगदीश वत्स के इन छोटे भाई बहनों को और न ही आगे उनकी औलादों को आज तक उत्तराधिकारी होने का कोई सम्मान नही मिल पाया है।
जगदीश वत्स के भतीजे गुरुदत्त वत्स ने बिना उत्तराधिकारी सम्मान के ही अपने अमर शहीद ताऊजी की विरासत को स्वयं के संसाधनों से आगे बढाया वही शहीद जगदीश वत्स की आश्रित छोटी बहनों व उनकी सन्तानो को भी आज तक उत्तराधिकारी होने तक का सम्मान मय्यसर नही हो सका है।जबकि उनके बलिदान दिवस पर हरिद्वार जिला प्रशासन द्वारा प्रतिवर्ष 14 अगस्त पर एक कार्यक्रम हरिद्वार के भल्ला पार्क में आयोजित किया जाता है।जिसमे अधिकृत रूप से उनके परिवार से केवल एक बार ही आमन्त्रित किया गया ।लेकिन कार्यक्रम की ओपचारिकता हर बार निभाई जाती रही। न तो उत्तराखंड सरकार और न ही जिला प्रशासन अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स को लेकर गम्भीर है।तभी तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की घोषणा के बावजूद आज तक हरिद्वार में शहीद जगदीश वत्स के नाम से स्वतंत्रता सेनानी सदन नही बन पाया,वही तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के जगदीश वत्स की जीवनी पाठ्यक्रम में शामिल करने के आदेश भी कही फाइलों में दबकर रह गए।आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत के समय देश की खातिर दिया बलिदान का सम्मान आजादी के 75 वर्ष बाद आज तक भी उनके उत्तरासधिकारियो को नही मिल पाया है।
क्या अमर शहीद जगदीश वत्स व उनके उत्तराधिकारियो साथ हो रहे इस अन्याय का प्रतिवाद नही होना चाहिए?वह तो भला हो शहीदों के प्रति सम्मान अभिव्यक्त करने वाले सन्त ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का,जिन्होंने स्वयं के खर्च से हरिद्वार के भल्ला पार्क में 17 वर्षीय शहीद जगदीश की प्रतिमा लगवाई और जिला प्रशासन को प्रेरित कर सरकारी स्तर पर 14 अगस्त को श्रद्धांजलि कार्यक्रम परम्परा शुरू कराई।लेकिन समय के साथ जहां उक्त स्वाधीनता सेनानी पार्क आस पास के दुकानदारों द्वारा अतिक्रमण का शिकार है,वही जिला प्रशासन भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम के नाम पर सिर्फ ओपचारिकता निभा रहा है।प्रति वर्ष श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शहीद जगदीश वत्स की जीवनी पाठ्यक्रम में शामिल करने व उनकी स्मृति में सरकारी स्तर पर एक पुरुस्कार शुरू करने की मांग उठती रही है।मेरे प्रस्ताव पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शहीद जगदीश वत्स की जीवनी पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लेकर अपर मुख्य सचिव को लिखित निर्देश भी दिया था,लेकिन उक्त पत्रावली सरकार बदलते ही कही लुप्त हो गई है।अलबत्ता जगदीश वत्स के भतीजे गुरूदत्त वत्स ने स्वयं के संसाधनों से शहीद जगदीश वत्स के गांव खजूरी अकबरपुर में उनकी स्मृति में खोले गए जगदीश प्रसाद स्मारक जूनियर हाईस्कूल परिसर में उनकी प्रतिमा लगवा दी है।जिसका अनावरण होना अभी शेष है।ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज हरिद्वार ने भी अपने इस छात्र शहीद जगदीश वत्स के नाम से वालीबाल टूर्नामेंट कराकर और कॉलेज परिसर में उनकी मूर्ति लगवाकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है।17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स ,जब कक्षा 10 के छात्र थे तो उन्होंने अपने तत्कालीन गुरु आचार्यश्री रामदेव के निधन से आहत होकर उन्हें जो काव्यांजलि प्रस्तुत की ,उस काव्यांजलि रूपी कविता को आर्य समाज के संस्थापक महऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक मे स्थान दिया।इसकी खोज फिल्म निर्देशक डा सुभाष अग्रवाल ने टंकारा, गुजरात प्रवास के दौरान की।सचमुच हमारे लिए यह गौरवपूर्ण उपलब्धि है।
अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के भतीजे गुरूदत वत्स चाहते है कि उनके ताऊजी को भी वही सम्मान मिले जो शहीद भगत सिंह को मिलता है।उनकी राय में शहीदो के बीच कोई भेदभाव नही होना चाहिए ,जिसने भी देश के लिए प्राण न्योछावर किये, वही नमन किये जाने योग्य है।जगदीश वत्स की बलिदान गाथा को जाने तो हरिद्वार में 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स ने सन 1942 में ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज में पढते हुएआजादी का बिगुल बजाया था। कालेज के छात्रों का नेतृत्व करते हुए 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स ने तिंरगे झण्डे हाथ में लेकर अंग्रेज पुलिस को चुनौती देने का साहस किया था। 13 अगस्त सन 1942 की रात्रि में छात्रावास में हुई छात्रो की एक बैठक में 14 अगस्त को तिरंगे फैहराने के लिए सडको पर निकलने और भारत माता की जय,इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाने के लिए, लिए गए निर्णय को अमलीजामा पहनाते हुए छात्रों का दल 14 अगस्त की सवेरे ही हरिद्वार की सडको पर निकल पडा था। पुलिस की छावनी के बीच भी जब छात्र जगदीश प्रसाद वत्स ने सुभाष धाट पर पहला तिरंगा फैहराया तो अंग्रेज पुलिस की एक गोली उनके बाजू को चीरती हुई निकल गई । धायल जगदीश ने धोती को फाडकर धाव पर बांध लिया और फिर दुसरा तिरंगा फैहराने के लिए डाकधर की तरफ दौड लगा दी। पुलिस की गोली चलने से बाकी छात्र तो तितर बितर हो गए थे ,लेकिन 17 वर्षीय जगदीश तिरंगे फैहराने की जिद पर अडिग रहा और उसने दौडते हुए जाकर दुसरा तिरंगा डाकधर पर फैहरा दिया। वहां भी पुलिस ने गोली चलाई ,जो जगदीश के पैर में लगी। जगदीश ने फिर पटटी बांधी और रेलवे लाईन के रास्ते हरिद्वार के रेलवेस्टेशन पर पहुंचकर पाइप के रास्ते उपर चढकर तीसरा तिरंगा फैहरा दिया। जैसे ही जगदीश तिरंगा फैहराकर नीचे उतरा तो राजकीय रेलवे पुलिस के इन्सपैक्टर प्रेम शंकर श्रीवास्तव ने उन्हे धेर लिया। जगदीश ने तांव में आकर एक थप्पड इन्सपैक्टर श्रीवास्तव को रसीद कर दिया, जिससे वह नीचे गिर पडा। इन्सपैक्टर ने नीचे पडे पडे ही एक गोली जगदीश को मार दी जो उनके सीने में लगी। तीसरी गोली लगते ही जगदीश मुर्छि्त हो गया। जिन्हे इलाज के लिए देहरादून सेना अस्पताल ले जाया गया। बताते है कि वहां जगदीश को एक बार होश आया था और उनसे माफी मांगने को कहा गया था परन्तु माफी न मांगने पर उन्हे कथित रूप में जहर का इंजेक्शन देकर उनकी हत्या कर दी गई। सहारनपुर जिले के ग्राम खजूरी अकबरपुर निवासी जगदीश वत्स का शव भी पुलिस ने उनके पिता पंडित कदम सिंह शर्मा को नही दिया था।उल्टे दुस्साहसी अंग्रेजो ने जगदीश वत्स को गोली मारने वाले पुलिस इन्स्पैक्टर प्रेम शंकर श्रीवास्तव को पुलिस मैडल प्रदान किया था। लेकिन देश आजाद होने पर प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जगदीश वत्स की राष्टृभक्ति व वीरता की प्रंशसा करते हुए एक विजय टृाफी वत्स परिवार को दी थी। जो धरोहर केरूप में आज भी सुरक्षित है।
अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के परिवार में किसी भी आश्रित को सरकार से स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी पेंशन या अन्य कोई सम्मान या सरकारी सहायता आज तक नही दी है।जबकि जगदीश वत्स की शहादत के एक वर्ष के अन्दर उनके माता पिता की मृत्यु हो जाने और घर में परिवार के नाम पर शहीद जगदीश की 15 वर्षीय छोटी बहन प्रकाशवती,13 वर्षीय छोटी बहन चन्द्रकला,10 वर्षीय छोटी बहन सुरेशवती और
मात्र 5 वर्षीय छोटा भाई सुरेश दत्त वत्स रह गए थे, जिनके पालन पोषण की जिम्मेदारी 15 वर्षीय बहन प्रकाशवती पर आन पडी थी।भले ही इस परिवार को कोई आर्थिक सहायता न मिले लेकिन यह परिवार शहीद जगदीश वत्स के उत्तराधिकारी होने का सम्मान प्राप्त करने का तो हकदार है,जो उसे मिलना चाहिए। (लेखक अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स के सगे भांजे है)