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दाऊ जी मन्दिर की होली में होती है गीले कपड़े के कोड़ों से हुरिहारों की पिटाई

मथुरा। ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में बलदेव के दाऊ जी मन्दिर की होली विशेष मानी जाती है। यहां की होली में ब्रज की प्रमुख होलियों के दर्शन होते हैं। इस होली को देखने के लिए पर्यटक तक लालाइत रहते हैं।

मथुरा से 25 किलोमीटर दूर खेली जानेवाली यह एक मात्र होली है जो मन्दिर के चौक में देवर भाभी के बीच खेली जाती है तथा इस होली में कल्याणदेव वंशज परिवार के लोग ही भाग लेते हैं।

दाऊ जी मन्दिर के रिसीवर रामकठोर पाण्डे ने बताया कि 09 मार्च को खेली जानेवाली इस होली की तैयारियां तेज हो गई हैं। इसके लिए 20 कुंतल टेसू के फूल, 50 कुुंतल विभिन्न रंग का गुलाल , पांच कुंतल फिटकरी, दस कुंतल चूने की सफेदी, पांच कुंतल केसरिया रंग, 10 कुंतल भुड़भुड़ मंगा ली गई है तथा 20 कुंतल गेंदा और गुलाब के फूल की पंखुड़ी 09 मार्च को खरीदकर आएगी।

उन्होंने बताया कि टेसू के रंग को गहरा करने के लिए उसमें फिटकरी, केसरिया रंग, चूना मिलाया जाता है। उन्होंने कहा कि चूंकि यह होली मन्दिर के चौक में ही खेली जाती है, इसलिए बैठने की व्यवस्था का व्यापक प्रबंध किया गया है।

इस होली को हुरंगा कहा जाता है। मंदिर के सेवायत गोविंद पाण्डे के अनुसार यह होली पूर्वान्ह लगभग 11 बजे समाज गायन से शुरू होती है। मन्दिर के पट खुल जाते हैं तथा लगभग एक घंटे तक समाज गायन होता है। इसके बाद मन्दिर के पट बन्द हो जाते हैं तथा मन्दिर के चौक में नये लहंगा फरिया पहने गोपियां इकट्ठा हो जाती हैं।

उधर होरी है होरी है कहते हुए हुरिहार मस्ती में चौक में बाल्टी लिये आ जाते हैं। इस बीच कृष्ण बल्देव के स्वरूप चौक में बने मंच पर विराजमान हो जाते है।चौक में बनी हौदियों से टेसू का रंग लेकर वे उसके छीटे गोपियों पर डालते हैं तो वे ऐसा करने से मना करती हैं और कुछ गोपियां तो मस्ती में नृत्य भी करने लगती हैं और रसिया के स्वर गूंज उठते हैं:- आज बिरज में होरी रे रसिया। होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया।।

आज बिरज म…………
गोपिकाएं अपने नये कपड़ों पर रंग डालने का विरोध करती हैं तो हुरिहार उनके ऊपर और रंग डालने लगते हैं और छीना झपटी में दोनो ही रंग से सराबोर हो जाते है तो गोपिया हुरिहारों के वस्त्र फाड़कर उन्ही गीले कपड़ों से हुरिहारों की पिटाई करती हैं और मन्दिर में कृष्ण बल्देव की झंडी लिए हुरिहार घूमते हैं और गायन , वादन तथा नृत्य की त्रिवेणी बहने लगती है।

मन्दिर की छत से रंग बिरंगे गुलाल की वर्षा उड़कर इन्द्रधनुषी वातावरण बनाती है तथा शहनाई वादन के मध्य रसिया के स्वर फिर गूंजने लगते हैं:- नन्द के तो ते होरी तब खेलूं मेरी पहुंची में नग जड़वाय। हुरंगा की चरम परिणति में हुरिहार हौदियों से रंग भरकर गोपियों पर डालते हैं तो गोपियां उनके वस्त्र फाड़कर कोड़ों से उनकी पिटाई करती है। उस समय का दृश्य बड़ा ही मनोहारी बन जाता है जब हुरिहार अपने किसी अधेड़ साथी को टांगकर गोपियों के पास लाते हैं और गोपियां उसकी कोड़ों से पिटाई करती हैं । इस बीच एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है:- ऐसो चटक रंग डारौ श्याम मेरी चूनर में लग गयो दाग री।

ऐसो….
हुरंगे के पूर्ण यौवन में पहुंचने पर गोपिया झंडे की लूट करती है वे पहले एक झंडे की लूट करती हैं फिर दूसरे झंडे की लूट करती हैं और लगभग दो घंटे में हुरंगा समाप्त हो जाता है।हुरिहार अपनी विजय का दावा करते हुए गाते हैं हारी रे गोपी घर चली जीत चले ब्रजराज….. और अपनी विजय का दावा करते हुए गोपियां गाती हैं हारे रे गोप घर चले जीत चली ब्रज नारि। क्षीर सागर की परिक्रमा के साथ दोनो ही पक्ष अपने घर चले जाते हैं।

जिलाधिकारी पुलकित खरे ने बताया कि इस होली की व्यवस्थाओं को पूर्व में वह वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शैलेष कुमार पाण्डे के साथ पूर्व में कई बार देख चुके हैं तथा पार्किंग से लेकर सुरक्षा व्यवस्था को सुनिश्चित कर लिया गया है।संवेदनशील स्थानों पर सादा वर्दी में महिला एवं पुरूष पुलिसकर्मी लगाए गए हैं।

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