गुमनामी के अंधेरे में ही गुम हो गए कै धूम सिंह चौहान

गोपेश्वर। गढ़वाल राइफल्स के जांबाज कैप्टन धूम सिंह चौहान प्रथम तथा तृतीय अफगान युद्ध में अद्भुत शौर्य का लोहा मनवा कर गुमनामी के अंधेरे में ही गुम हो गए। इसके बावजूद रिटायर होने के बाद उन्होने पैतृक गांव सरमोला तथा गोचर में शिक्षा की बेहतरी के लिए अलख जलाए रखी।
पोखरी ब्लाक के सरमोला गांव के कैप्टन धूम सिंह चौहान गढ़वाल राइफल्स के अग्रणी नायकों में सुमार रहे। 1886 में पैदा हुए धूम सिंह चौहान में सेना में जाने की ललक रही। इसके चलते वर्ष 1930 में वे 1/39 रॉयल गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए।

गढ़वाल राइफल्स के वह पहले भारतीय अफसर रहे जो राइफलमैन के रू प में भर्ती हुए और किंग्स कमीशन प्राप्त कर सरदार बहादुर के खिताब और जागीर हासिल कर 31 साल बाद रिटायर हुए। सेना में जब गिने चुने लोग ही कार्यरत थे तब उन्होंने न सिर्फ सेना में भर्ती होने की चुनौती स्वीकार की अपितु सेना में रहते हुए आगे बढने का जज्बा भी रहा।

प्रथम विश्व युद्ध के समय सिग्नलिंग के लिए भले ही संक्रमण काल और प्रयोग का समय रहा हो किंतु उन्होने हमेशा नए नए क्षेत्रों में दक्षता हासिल कर कुशल सिग्नलर और सिग्नल इंस्ट्रक्टर के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। प्रथम विश्व युद्ध में भी 1914—15 में वह बहादुरी और बुद्धि चातुर्यता से लड़े।

इस दौरान दो बार लड़ते लड़ते जख्मी भी हुए। प्रथम युद्ध युद्ध के तत्काल बाद 1919 में तृतीय अफगान युद्ध में भी वह ऐतिहासिक विजय के भागीदार बने। तृतीय अफगान युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1920 में धूम सिंह चौहान को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया का खिताब मिला था।

इसी दौरान सैन्य सेवा में योगदान के लिए पहला बड़ा पुरस्कार भी मिला। इस तरह प्रथम और तृतीय अफगान युद्ध में पराक्रम और शौर्य के बल पर उन्होने गढ़वाल की पूरी दुनिया में विशिष्ट पहचान भी बनाई। प्रथम विश्व युद्ध के नायक विक्टोरिया क्रास (वीसी) दरवान सिंह नेगी के नेतृत्व में उन्होने भी गढ़वाल की माटी का नाम रोशन किया। 1 अक्टूवर 1921 को गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट सेंटर की स्थापना हुई।

गढ़वाल राइफल्स के महानायक वीसी दरवान सिंह नेगी 192४ में सूबेदार पद से रिटायर हुए। दूसरे बीसी गबर सिंह नेगी 1915 में ही वीर गति को प्राप्त हो गए थे। पहले सुबेदार मेजर मोती सिंह नेगी 1887, ऑनरेरी कै नैन सिंह चिनवाण और ऑनरेरी लेफ्टिनेंट मकर सिंह कुंवर 1920 में रिटायर हुए थे। गढ़वाल रेजिमेंट सेंटर की स्थापना के समय सुबेदार धूम सिंह चौहान की वरिष्ठता वायसराय कमीशन आफिसर में 9 वें नंबर की थी।

सेंटर की स्थापना के बाद ऑर्डर ऑफ इंडिया और किंग्स कमीशन प्राप्त करने वाले वह सेंटर के दूसरे अफसर रहे। 1930 में यह गौरव मेहरवान सिंह बुटोला को मिला था। साल 19२९ में एक साल तक धूम सिंह चौहान ने सम्राट जॉर्ज पंचम के आर्डरी-ऑफिसर के रू प में में शाही आवास बर्कि घम पैलेस में भी कार्य किया।

इस पद पर के लिए चयनित होने के लिए बहुत सारे मानदंडों से सैन्य अधिकारियों को परखा जाता था। उन्हें 19३2 में किंग्स कमीशन हासिल हुआ। प्रतिष्ठित ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया (फस्र्ट क्लास) और सरदार बहादुर का खिताब भी उन्हें मिला। रिटायर होने के बाद कै साहब को फस्र्ट क्लास जागीर भी मिली। रिटायर होने के बाद भी उन्हें गवर्नर यूनाइटेड प्रोविंस के एडीसी रहने का भी गौरव मिला।
प्रथम विश्व युद्ध के नायक वीसी दरवान सिंह नेगी की मांग पर सम्राट जॉर्ज पंचम ने कर्णप्रयाग में मिडिल स्कूल 1918 में खोल दी। कै धूम सिंह चौहान 1933 में ऑनरेरी कैप्टन पद से सेना से रिटायर होने के बाद गौचर में बस गए। गौचर में वे कर्णप्रयाग मिडिल स्कूल की तर्ज पर स्कूल खोलने के प्रयासों में जुट गए। सीमित संसाधनों के बावजूद 1947 में उन्होने गौचर में पब्लिक जूनियर हाईस्कूल की स्थापना कर डाली।

हालांकि अपने जीवनकाल में वे स्कूल के उच्चीकरण के लिए समर्पित रहे। गौचर में बालिका विद्यालय की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 19४4 में गौचर मेले को राजकीय संरक्षण प्रदान करने की मुहिम में भी उन्होने अपने को खफाए रखा। लेडी विलिंग्टन तथा जवाहर लाल नेहरू के गौचर आने पर उन्होने गौचर मेले को राजकीय संरक्षण देने की मांग प्रमुखता से उठाई। तब उनकी मांग मान ली गई थी।

इसी दौर से गौचर में प्रतिवर्ष राजकीय औद्योगिक एवं विकास मेले का आयोजन जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर से 20 नवंबर तक किया जा रहा है। पैतृक गांव सरमोला के प्राथमिक विद्यालय के लिए उन्होने 2 नाली जमीन दान दी थी। कैप्टन साहब की बेटी औरंग गांव निवासी गोदांबरी देवी (88)तथा बेटा सुरेंद्र सिंह चौहान रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं। पौत्र दिग्विजय सिंह चौहान भी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत हैं तो दूसरे पौत्र संजीव चौहान इंजीनियरिंग कर गौचर में ही कारोबार करते हैं।

इस तरह तीसरी पीढ़ी के लोगों को भी आज तक बहादुरी की पेंशन मिल रही है। संजीव चौहान का कहना है कि दादा कै धूम सिंह चौहान ने गढ़वाल की गौरवशाली सैन्य परंपरा के बीज बोए थे। आज गढ़वाल की गौरवशाली सैन्य परंपरा का दुनिया लोहा मान रही है। उनका कहना है कि कै साहब का प्रथम विश्व युद्ध के साथ ही अफगान युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान होने के बावजूद एक तरह से वह गुमनाम ही रहे।

गौचर में स्कूल से लेकर गौचर मेले को सरकारी संरक्षण दिलवाने के प्रयासों से भी अनजान रहे। इसके बावजूद उनका गढ़वाल की सैन्य परंपरा को बढ़ावा देने के लिए योगदान किसी से छिपा नहीं रहा। हालांकि उनके भीतर इस पिछले क्षेत्र को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की ललक तो थी किंतु वर्ष 1953 में वह दुनिया को अलविदा कर गए।

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