वैक्सीन : सीधे डील करें केंद्र

संपादकीय 

धर्मपाल धनखड़
कोरोना की दूसरी लहर के संक्रमण की तीव्रता अब धीरे-धीरे कम हो रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, करीब तीन हफ्ते में संक्रमण की दर घट कर 39 फीसद तक कम हो गयी है। हालांकि, अब भी रोजाना 2.25 लाख नये संक्रमित मिल रहे हैं। लेकिन मौतों का आंकड़ा घटने की बजाय बढ़ रहा है। मई महीने में औसतन रोजाना 3500 लोगों की मौत कोरोना से हुई है। वहीं, एक दिन में 4454 मौतें भी र्हुइं, जो दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। ऐसे में साफ है कि स्थिति बेहतर नहीं, बल्कि अब भी चिंताजनक है।

  • देश के 130 करोड़ लोगों के जीवन का सवाल है। 500 रुपये प्रति व्यक्ति वैक्सीन के खर्च के हिसाब से 56 हजार करोड़ रुपये खर्च होगा। यदि केंद्र सरकार सीधे कंपनियों से डील करें तो ये काफी कम हो सकता है। ज्यादातर राज्यों के पास स्वास्थ्य का बजट बेहद मामूली है। ऐसे में उनके लिए वैक्सीन खरीद पाना संभव ही नहीं है…

कोरोना की पहली लहर में पीक के बारह दिन बाद मौतों का आंकड़ा भी घटने लगा था, लेकिन इस बार पीक के 18 दिन बाद भी मौतों की दर कम नहीं हो रही है। इस पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों को खास ध्यान देना चाहिए। कोरोना के साइड इफेक्ट के रूप में ब्लैक फंगस के मामले भी बढ़ रहे हैं। अब तक ब्लैक फंगस के 454 मामले सामने आ चुके हैं। इसके साथ ही देश में व्हाइट और यलो फंगस के मामले भी पाये जा रहे हैं। हालांकि, अब अस्पतालों में बेड के लिए मारा-मारी पहले जैसी नहीं है और आक्सीजन की आपूर्ति भी सहज हो गयी है। कोरोना में रेमडेसिविर के इंजेक्शन के प्रयोग पर रोक के बाद लोगों को इसे ब्लैक में खरीदने से छुटकारा मिल गया है। लेकिन ब्लैक फंगस के टीकों की कमी लगातार बनी हुई है। टीके नहीं मिल पाने के कारण मौत होने के समाचार भी मिल रहे हैं।

सरकार को जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी, फार्मा कंपनियों तथा निजी अस्पतालों की अंधी लूट पर रोक लगाने की दिशा में भी कड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि महामारी से आहत जनता को कुछ राहत मिल सके। कोरोना संक्रमण की दर नीचे लाने में सबसे अहम भूमिका विभिन्न प्रदेशों में लगाए गये लाॅकडाउन की रही है। संक्रमण की दर घटने के साथ ही राज्यों ने लाकडाउन में छूट देना भी शुरू कर दिया है। यूं भी लाॅकडाउन स्थाई समाधान नहीं हो सकता है। लाॅकडाउन में छूट दिये जाने के साथ ही संक्रमण का खतरा फिर बढ़ सकता है। कोरोना से बचाव के लिए दुनिया में अब तक वैक्सीन ही एकमात्र पुख्ता रास्ता सामने आया है। कई यूरोपीय देश जिनकी कोराना की पहली लहर में बुरी हालत हुई थी वो वैक्सीनेशन के जरिए ही संक्रमण को रोक पाने में सफल हो पाये हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी देश में वैक्सीनेशन मुहिम तेज करने के निर्देश दिये हैं। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा वैक्सीन की कमी है। इसके चलते विभिन्न प्रदेशों में 18 से 44 आयु वर्ग के लोगों को वैक्सीन लगाना बंद करना पड़ रहा है। बड़ी संख्या में वैक्सीनेशन सेंटर बंद करने पड़े हैं। केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन की कमी को देखते हुए पहले टीके के बाद दूसरा टीका लगवाने की समय अवधि बढ़ाने के निर्देश दिये हैं। यहां ये बात ध्यान देने की है कि अब तक देश में 90 फीसद लोगों को कोविशील्ड की वैक्सीन दी गयी है। इस वैक्सीन का निर्माण ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने किया है। वहां किये गये अध्ययनों के मुताबिक वैक्सीन तभी ज्यादा कारगर साबित होगी, जब दोनों टीकों के बीच अधिकतम 28-30 दिन का अंतराल रखा जाये। अतः सरकार को जिन देशों में वैक्सीन बनी है उनके शोधों और अध्ययनों पर ही निर्भर रहना होगा। और उन्हीं के परिणामों के मुताबिक वैक्सीन के अंतराल की समय सीमा भी तय करनी होगी।

वैक्सीन की कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को विदेशों से सीधे वैक्सीन खरीदने के निर्देश दिये थे। इस पर नौ राज्य सरकारों ने आमंत्रित किये, लेकिन उनका परिणाम जीरो रहा। तमाम कंपनियों ने अगले साल जनवरी से पहले वैक्सीन की आपूर्ति करने से मना कर दिया। अमेरिकी कंपनी मार्डना ने पंजाब और फाइजर ने दिल्ली को टीका देने इंकार कर दिया। इन कंपनियों का कहना हैं कि राज्यों के टेंडरों पर उन्होंने विचार ही नहीं किया। सभी ने तीन से छह महीने में आपूर्ति करने की शर्त रखी है जो संभव नहीं है। कंपनियों का कहना है कि वैश्विक मांग को देखते हुए भारत को टीकों की आपूर्ति अगले साल जनवरी से पहले नहीं हो सकती। इसके साथ ही इन कंपनियों का मानना है कि टीकों की जल्द आपूर्ति के लिए केंद्र सरकार को आर्डर करना चाहिए। राज्यों की अपेक्षा केंद्र से डील करना कंपनियों के लिए भी सुविधाजनक रहता है। महामारी से लड़ने के लिए केंद्र सरकार को सीधे आर्डर करना चाहिए, जिससे काम आसान हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार वैक्सीन का आर्डर करने में पहले ही देरी कर चुकी है। उस पर राज्यों को सीधे वैक्सीन खरीदने की कह कर एक महीने का समय और जाया कर दिया है। देश के 130 करोड़ लोगों के जीवन का सवाल है। 500 रुपये प्रति व्यक्ति वैक्सीन के खर्च के हिसाब से 56 हजार करोड़ रुपये खर्च होगा। यदि केंद्र सरकार सीधे कंपनियों से डील करें तो ये काफी कम हो सकता है। ज्यादातर राज्यों के पास स्वास्थ्य का बजट बेहद मामूली है। ऐसे में उनके लिए वैक्सीन खरीद पाना संभव ही नहीं है।
महामारी से निपटना केंद्र की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसके लिए केंद्र सरकार ने 35 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान बजट में किया भी है। उस पैसे से केंद्र को विभिन्न कंपनियों से सीधे वैक्सीन खरीद कर राज्यों को उपलब्ध करवानी चाहिए। बजट में निर्धारित पैसा कम पड़े तो पीएम केयर फंड या अन्य संसाधनों से जुटाया जा सकता है। महामारी का कहर लगातार जारी है। अब तक तीन लाख से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। तीसरी लहर की आशंका भी जताई जा रही है। वैज्ञानिकों की इस चेतावनी को भी ध्यान में रखते हुए जरूरी तैयारी करनी है। ये समय नये प्रयोग करने का नहीं है। 1960 से वैक्सीन या दवा आयात करने का काम केंद्र सरकार करती आ रही है। राज्यों के पास इसका अनुभव ही नहीं है। ऐसे में वैक्सीन मंगवाने की जिम्मेदारी राज्यों पर डालने का केंद्र का फैसला भले ही पार्टीगत राजनीतिक रणनीति के हिसाब से उपयुक्त हो, लेकिन संवैधानिक और मानवीय दृष्टिकोण से ये किसी भी तरह उचित नहीं है।
ऐसे में अब ये बात साफ हो चुकी है कि विदेशों से वैक्सीन मंगवाने और राज्यों को उपलब्ध करवाने और वैक्सीन को मानकों के हिसाब सुरक्षित रख पाने में केंद्र ही सक्षम है। अंत में इस जिम्मेदारी को केंद्र को ही उठाना होगा और ये उसकी देश की जनता के प्रति जवाबदेही भी है। ऐसे में वैक्सीन जल्द उपलब्ध करवाने के लिए केंद्र सरकार को शीघ्रातिशीघ्र ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि देश के अमूल्य जीवन को बचाया जा सके।

Leave A Reply

Your email address will not be published.