अनिल शुक्ल
नई दिल्ली। क्या महिला राजनेत्रियों की पूछ लेफ़्ट पार्टियों में भी उसी तरह नाममात्र की होती है जैसी अन्य ‘बुर्ज़ुआ’ पार्टियों में? केरल में हाल में गठित नए मंत्रिमंडल से जिस प्रकार पिछली स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा को बाहर का रास्ता दिखाया गया है, उससे इस कथन की सच्चाई ज़ाहिर होती है। मख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन और उनके समर्थक भले ही ‘पार्टी बहुमत’ या इस तरह की कितनी भी सफाईयाँ दें, पूरे देश में जो सन्देश गया है, आने वाले दिनों में मार्क्सवादियों को इसका खामियाज़ा भुगतना ही पड़ेगा इस बात में किसीको संदेह नहीं।
पहले नीपा वायरस और कालांतर में कोविड 19 की महामारी से शानदार तरीके से निबटने वाली हाई प्रोफ़ाइल शैलजा को सारी दुनिया में कोरोना विरोधी जंग में केरल मॉडल की नायिका के रूप में देखा जाता था। इसी लोकप्रियता के चलते हाल के विधानसभा चुनावों में उन्होंने विधानसभा क्षेत्र मत्तनूर (जिला कन्नूर) में अपने यूडीएफ प्रतिद्वंदी को 60 हज़ार से अधिक मतों से धराशायी करके एक नया इतिहास रचा था। केबिनेट से हटाकर विधानसभा में मुख्य सचेतक जैसे ग़ैर महत्वपूर्ण पद पर बैठाने के माकपा के निर्णय से न सिर्फ़ राज्य का मतदाता हैरान है बल्कि माकपा कार्यकर्ताओं के बड़े हिस्से में भी इसे लेकर गहरा रोष भी व्याप्त है। पार्टी के इस ‘तुग़लकी फैसले को एक और ऐतिहासिक भूल के रूप में देखा जा रहा है।
हमारे संसदीय प्रजातंत्र में महिलाओं का विकास वैसे ही एक बेहद मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है। ऐसे में केरल मंत्रिमंडल से शैलजा टीचर जैसी योग्य राजनेत्री और अनुभवी प्रशासक का हटाया जाना एक बेहद दुःसाहसी कदम है। अनिल शुक्ल बताते हैं कि क्यों आने वाले समय में इसका खामियाज़ा लेफ़्ट को भुगतना ही पड़ेगा।
सभी पुराने मंत्रिमंडल के साथियों को अलविदा कहने और मुख्यमंत्री को छोड़ नेतृत्व में सभी ताज़ा चेहरों को शामिल किये जाने के एजेंडे को लेकर चुनाव परिणामों के तत्काल बाद हुई पार्टी की राज्य कार्यकरिणी की बैठक में बड़े बहुमत (81 बनाम 7) द्वारा लिए गए निर्णय से पहले उपस्थित सदस्यों को याद दिलाया गया कि चुनाव से पूर्व की कार्यकारिणी की बैठक में वित्त मंत्री टॉमस इसाक़ सहित निवर्तमान मंत्रिमंडल के 4 सदस्यों को विधानसभा चुनाव तक न लड़ाने का फ़ैसला लिया गया था।
राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे मुख्यमंत्री पी विजयन के कार्यालय के समानांतर किसी अन्य राजनीतिक केंद्र के उदय होने की सभी संभावनाओं को मिटा डालने के उनके प्रयासों के रूप में ले रहे हैं। विधान सभा चुनावों से पूर्व हुई पार्टी पोलित ब्यूरो की मीटिंग में सुश्री शैलजा के कामों पर पीठ ठोंकने के साथ तय किया गया था कि यदि चुनावों के परिणाम लेफ़्ट के पक्ष में आते हैं तो भविष्य की सरकार में उन्हें प्रोन्नत किया जायगा। इस मीटिंग में पोलित ब्यूरो सदस्य के रूप में पी विजयन भी मौजूद थे।
कोरोना विरोधी जंग में केरल मॉडल की नायिका रही हैं शैलजा
उन्हें केबिनेट से हटाकर विस में ग़ैर महत्वपूर्ण पद पर बैठाना रही माकपा की भूल
चूंकि पिनाराई विजयन स्वयं यह घोषणा करते रहे हैं कि नया कार्यकाल उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम राउंड होगा, लिहाज़ा शैलजा टीचर की लोकप्रियता का ग्राफ़ उन्हें अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने लग गया था और ऐसा माना जाता है कि वर्तमान मुख्यमंत्री इसी बात को पचा नहीं पा रहे थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि लंबे समय से पार्टी नेतृत्व पर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में रहने के चलते पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में विजयन समर्थकों का बहुमत है। इन समर्थकों का यह कथन कि पूरे मंत्रिमंडल को ही बदला जा रहा है तब ज़्यादा तर्कसंगत साबित होता जब बात सिर्फ़ पुरुष सदस्यों तक सीमित रहती। गत मंत्रिमंडल में पहले ही महिला प्रतिनिधित्व का संकट मुंह बाए खड़ा था। 21 सदस्यीय मंत्रिमंडल में केवल 3 महिलायें थीं। 33 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व का ढिंढोरा पीटने वाली सीपीएम के मंत्रिमंडल में शैलजा के हटनेसे इस बार सिर्फ़ 2 महिलाएं ही (1 माकपा और 1 भाकपा) रह जाएंगी। माना जाता है कि हमारे संसदीय प्रजातंत्र में महिलाओं का विकास वैसे ही एक बेहद मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है, ऐसे में शैलजा जैसी योग्य राजनेत्री और अनुभवी प्रशासक का हटाया जाना एक बेहद दुःसाहसी कदम है। निःसंदेह आने वाले समय में सीपीएम को इसके दूरगामी परिणाम भुगतने पड़ें सकते हैं।
शैलजा की दक्षता, संकट प्रबंधन और सामान्य व्यक्ति की उन तक पहुँच, एलडीएफ़ के चुनावी प्रबंधन में उनका दख़ल और मिलने वाली बड़ी जीत में सरकार की कोविड 19 और नीपा जैसे गंभीर रोगों के ऊपर शानदार सफलता आदि ऐसे कारण थे जिन्होंने उन्हें हद दर्जे का लोकप्रिय बना दिया और यही लोकप्रियता उनके हटाए जाने का प्रमुख कारण बनी। 34 साल तक पश्चिम बंगाल में शासन करने वाली माकपा राज्य के हालिया चुनावों में भरभरा कर ढह गयी। बेशक़ अपनी सफाई में सीपीएम चुनावों को द्विपक्षीय सीमित किये जाने का आरोप लगाए लेकिन सवाल यह है कि क्यों वह केवल 4.72 % वोट ही हासिल कर सकी। आख़िर वे कौन कौन सी ऐतिहासिक भूले थीं जिन्होंने बंगाल में उसका यह हाल किया। केरल में परंपरा को धतियाते हुए लगातार दूसरी बार चुनाव जीत कर बेशक़ उसने एक नया इतिहास रचा हो लेकिन इस नए इतिहास के रचने वालों को ही जब पार्टी सत्याच्युत कर देती है तब यह एक चौंकाने वाला तथ्य बन जाता है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सीपीएम एक काडर वाली अनुशासित पार्टी है। पार्टी की राज्य कार्यकारिणी ने चुनावों से पहले ही यह फैसला लिया था कि 2 बार से अधिक विधायक का चुनाव जीतने वालों को इस बार टिकट नहीं दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में 4 कैबिनेट मंत्री भी चुनाव से बाहर हो गए थे। इन्हीं फैसलों में एक फैसला समूचे नए मंत्रिमंडल में पुराने सभी मंत्रियों के स्थान पर नए चेहरों को लाने का भी था। सवाल यह उठ ता है कि तब यह फार्मूला मुख्यमंत्री पर क्यों नहीं लागू हुआ? भले ही वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन केबिनेट मंत्री के पद पर तो वह सन 96 से 98 तक मंत्री रह ही चुके हैं। इस तरह मंत्रिपद पर उनका चुनाव तीसरी बार है। इतना ही नहीं, पार्टी के राज्य सचिव पद पर भी वह 1998 से 2015 तक लगातार क़ाबिज़ रहे हैं। ज़ाहिर है उनके लिए नियमों में हेराफेरी की गयी। तब क्या इस तरह की ढील केके शैलजा के लिए नहीं छोड़ी जा सकती थी जिन्होंने कोविड के भीषण संकट काल में रणचंडी की शानदार भूमिका का निर्वाह किया हो और मौजूदा समय में बीमारी के संकट को देखते हुए उनकी सरकार में उपलब्धता बेहद ज़रूरी है?
केरल देश का पहला कोविड संक्रमित राज्य था और यहीं इस वायरस का पहला बड़ा हमला हुआ था। केरल ने चंद महीनों में ही इस बीमारी पर जिस तरह से नियंत्रण किया था उसने पूरे देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था। इस अभियान के पीछे केरल की स्वास्थ्यमंत्री केके शैलजा का पूरी शक्ति के साथ जुटना एक महत्वपूर्ण घटना थी। लम्बे समय के एलडीएफ और कालांतर में यूडीएफ़ द्वारा गठित ‘पब्लिक हेल्थ सिस्टम’ ने भी इस दिशा में उनकी ज़बरदस्त मदद की। यहाँ जन स्वास्थ्य तंत्र उस तरह से निष्क्रिय नहीं था जैसा कि देश के अन्य राज्यों में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया था। शैलजा टीचर ने अपने स्वास्थ्य सचिव के साथ समूचे राज्य के शहरों और गाँवों के लिए ऐसी व्यापक कोविड रक्षा योजना तैयार की थी जो पहली लहर के समय तो कारगर साबित हुई ही, दूसरी मौजूदा लहर में भी उसने अन्य राज्यों की तरह अपने निवासियों को पतझड़ के पत्तों की तरह टपकने से रोक लिया।
कोविड की पहली वेव में समूचे राज्य में बड़े पैमाने पर न सिर्फ़ कोविड विशेषज्ञ अस्पतालों की श्रंखलाओं का निर्माण किया गया बल्कि पंचायतों तक के स्तर पर स्थापित क्लीनिकों को भी कोविड जाँच और आइसोलेशन केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। पहली वेव के दौरान ही जिस तरह ऑक्सीजन का संकट देश भर में मुंह बाए खड़ा हो गया था, केरल ने इतनी बहुतायत में ऑक्सीजन और ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण किया कि दूसरी वेव के समय उसका 40 प्रतिशत उत्पादन ही राज्य के रोगियों के काम आ रहा है। शेष उत्पादन को पड़ौसी राज्यों में बाँटने का सिलसिला जारी है।
यही नहीं, कई सदियों से केरल में आयुर्वेद की पुरातन परंपरा सक्रिय है पहली लहर के दरमियान कोविड इलाज के बतौर देश भर में जहाँ रामदेव और उनकी पतंजलि सरीकी आयुर्वेदिक दुकाने लोगों को लूटने का काम करती रही थीं, तब शैलजा टीचर और उनकी टीम बेहद शांतिपूर्ण तरीके से अपनी इस देशज आयुर्वेद परंपरा का उपयोग गाँव और शहरों में लोगों की प्रतिरोध क्षमता को विकसित करने के प्रयोग के रूप में करने में जुटी थीं। कालांतर में हुए अध्ययनों ने उनके इन प्रयोगों के शानदार परिणाम सारी दुनिया के समक्ष प्रदर्शित हुए।
केके शैलजा ने इस महामारी को लेकर जो क़ानूनी कार्रवाइयां की हैं, वह भी अद्भुत हैं। मीडिया में उनका ज़िक्र और प्रचार न मालूम किन कारणों से होने से रोका गया है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में प्लेग की महामारी से निबटने के नाम पर अंग्रेज़ हुकूमत ने कतिपय ‘महामारी एक्ट’ का निर्माण किया था। ये नए क़ानून महामारी से घबराये, डरे हुए और अशिक्षित भारतवासियों की अनजाने में की गई ऊटपटांग और अज्ञानी कार्रवाइयों के प्रति मानवीय तरीके से प्रशिक्षित करने की बजाय साम्राज्यवादी व्यवस्था को धमकाने की क्रूर कार्रवाईयों के असीमित अधिकार प्रदान करते थे। ये सन 1860 में स्थपित आईपीसीकी महामारी सम्बद्ध हिंसक धाराओं के अतिरिक्त थे। सभी प्रकार के महामारी क़ानून जिला कलेक्टर को असीमित अधिकार देने के साथ साथ नागरिकों से उनके बचे-खुचे लोकतान्त्रिक अधिकारों को भी छीन लेते थे। स्वतंत्र भारत में न सिर्फ़ इन महामारी क़ानूनों को महफूज़ रहने दिया गया बल्कि कोरोना काल में अध्यादेश (और बाद में संसद ) द्वारा कुछ और नए और कड़े क़ानूनों का भी निर्माण किया गया। ये क़ानून न सिर्फ़ जिलाधिकारियों को अनियंत्रित अधिकार प्रदान करते हैं, बल्कि आम जन से उनके सभी लोकतान्त्रिक अधिकार छीन लेने के मामले में भी ये क़ानून पुरानों से कमतर क्रूर नहीं थे।
शैलजा की पहल पर केरल ने इस मामले में नया प्रयोग किया। वहां इन क़ानूनों में संशोधन करके विधान सभा में महामारी क़ानूनों का बड़ा अधिकार ग्रामीण और शहरी पंचायतों को दे दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के अन्य राज्यों में साल भर से ज़्यादा समय से जहाँ सत्तारूढ़ विधायक और सांसद अपनी और अपने मतदाता की सुनवाई न होने और प्रशासन के गूंगा-बहरा होने के क़िस्सों को लेकर खुलेआम रोते दिख रहे हैं, वहीँ केरल में सभी फैसले लोकतान्त्रिक तरीके से ग्राम पंचायतें, शहरी नगर पालिकाएं और नगर निगम लेते दिख रहे हैं। इस नए सिस्टम को लेकर लोगों में किस क़दर संतोष था, इसका नज़ारा विधानसभा चुनावों के नतीजों ने दिखा दिया।
कहा जाता है कि शैलजा टीचर की लोकप्रियता मुख्यमंत्री पिन्नराई विजयन को सुहाती नहीं थी। पार्टी सूत्र उनका भविष्य उनके दामाद में देख रहे हैं जो पहली बार विधायक बने हैं। लेफ्ट के पिटारे में ऐतिहासिक भूलों का अम्बार है। वे बेहिचक इन भूलों को कर भी लेते हैं और ध्वस्त होने पर आत्मालोचना के नाम पर उसे स्वीकार करने में उन्हें गुरेज़ भी नहीं होता। भारत की लेफ़्ट पार्टियों में आज़ादी के बाद से ही महिला नेताओं का ज़बरदस्त टोटा रहा है। सीपीएम में तो फिर भी हाल के कुछ दशकों से एकमात्र वृंदा करात आभूषण के बतौर दिखाई पड़ जाती हैं, सीपीआई के पास वैसा भी कुछ नहीं हैं। नक्सली समूहों में ज़रूर गाहे-बगाहे महिला नेतृत्व की गूँज सुनाई पड़ती रहती है, शीर्ष स्तर पर वहां भी कोई महिला नेतृत्व नहीं है। केके शैलजा ज़रूर लेफ़्ट सियासत में ऐसी नेता के रूप में उभर रही थी जिनके विकास का शोर सारी दुनिया में सुनने को मिल रहा था। माना जा रहा था कि इस बार वह गृह मंत्रालय या उस जैसे किसी अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालय की दावेदार बनेंगी लेकिन जिस असंस्कारगत तरीके से सरकार से उनकी विदाई की गयी है, वह सचमुच शर्मनाक है।