- ‘हर्ड इम्युनिटी’ हासिल करने को 70 फीसद आबादी का टीकाकरण आसान नहीं
- कोरोना की दूसरी लहर से लोकप्रिय नेता मोदी की छवि भी हुई प्रभावित
संक्रमण की दर में लगातार गिरावट आ रही है। कानपुर आईआईटी के वैज्ञानिक डॉक्टर मनिंद्र अग्रवाल की मानें तो मई का ‘पीक’ अब उतार पर है। उनके हिसाब से मई के दूसरे सप्ताह में ही ‘पीक’ आना था। कुछ राज्यों में मई के उत्तरार्द्ध में पीक आना था। आने वाले समय में संक्रमण और घटेगा। यह तो होना ही था।
अभी लोग भूले नहीं हैं कि किस तरह लोग एक ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए भागे-भागे फिर रहे थे। अस्पताल में भर्ती के लिए तांता लगा हुआ था। लोग एक बिस्तर के लिए तरस गए थे। कौन सा ऐसा जनप्रतिनिधि होगा जिसका फोन मरीज को भर्ती कराने की गुहार से न गूंजा हो? शायद ही कोई ऐसा तीमारदार होगा जो आईसीयू में भर्ती मरीज की कुछ खास दवाइयों के लिए न भटका न हो।
असली चुनौती अब आ रही है। पिछले साल की तरह देश में तमाम घोषणाएं इस बार भी की गई हैं। पिछले साल की घोषणाओं की हकीकत से सब वाकिफ भी हैं। पीएम केयर फंड से पचास हजार वेंटीलेटर की खरीद के आदेश पिछले साल दिए गए थे। चालीस हजार पहले से थे। यानी ऑक्सीजन मरीज को देने के लिए पर्याप्त मशीनी बंदोबस्त हो जाना था।
पर, हुआ क्या? एक साल बाद आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा कि राज्य सरकारें जल्द जांच करें कि सारे वेंटीलेटर चालू क्यों नहीं हुए? ऐसी ही स्थिति 551 प्रेशर स्विंग एब्सॉर्प्शन (पीएसए) को लेकर हुई। पिछले साल घोषणा के बावजूद अक्तूबर में टेंडर हुआ। इस साल मई तक यह चालू हो जाने थे। अप्रैल में 33 चालू हुए थे। ऐसा क्यों? हैरत की बात है कि जनवरी में इस मद में धन भी आवंटित कर दिया गया।
सवाल उठता है कि घोषणाओं पर अमली जामा पहनाने में कोताही के लिए कौन जवाबदेह है? ‘सिस्टम’ की नाकामी की बात कर मामले को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता है। आखिर सिस्टम को चलाता कौन है? क्या नौकरशाही इसका अभिन्न अंग नहीं होती है? लेकिन, सुर्खियों से नौकरशाही की लापरवाही सिरे से नदारद है। नौकरशाही को दिशा निर्देश देने वाली सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकती है? यदि ऐसा है तो क्या आपने किसी नौकरशाह के खिलाफ ढिलाई को लेकर किसी कार्रवाई की खबर सुनी है?
आसान से सवाल को पेचीदा बना दिया गया है। यही मुसीबत की जड़ भी है। निश्चित तौर पर दूसरी लहर उतार पर है। लेकिन, तीसरी लहर की आशंकाओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन चेता चुके हैं कि कोरोना से बचाव के उपायों में जरा भी ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। इस पर गंभीरता से अमल के कारण ही हम तीसरी लहर से बच सकेंगे। इसके साथ ही टीकाकरण भी बेहद जरूरी है।
यही बात हैदराबाद आईआईटी के प्रोफेसर एम. विद्यासागर कहते हैं। उनका भी मानना है कि तेजी से टीकाकरण ही एकमात्र रास्ता है। तमाम विशेषज्ञ भी यही मानते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश 35 से 40 फीसद आबादी को दो डोज दे चुके हैं। वहां देश सामान्यीकरण की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। जाहिर है कि औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियां भी जल्द ही जोर पकड़ने वाली हैं। लेकिन, अपने देश में टीकाकरण की रफ्तार काफी कम है। अब तक देश भर में कोई 19 करोड़ लोगों का ही टीकाकरण हो सका है। इनमें से भी दोनों खुराक लेने वालों की तादाद महज 4.16 करोड़ ही है। यह आंकड़ें 22 मई तक के हैं। यानी चार महीनों में औसतन 16-17 लाख लोगों को रोजाना टीका दिया जा सका।
यह आंकड़े डराने वाले हैं। सरकार भले ही दावा करे कि जुलाई से दिसंबर तक 2.16 अरब डोज मिल जाएगी। लेकिन, इस बात की पड़ताल की भी जरूरत है कि 135 करोड़ आबादी वाले देश में सिर्फ दो कंपनियों पर ही टीके की सप्लाई के लिए भरोसा क्यों किया गया? यह जानते हुए भी कि पुणे की सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया (एसएसआई) ने कोई वैक्सीन ईजाद नहीं की है। वह एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड की ईजाद की हुई वैक्सीन की सिर्फ निर्माता है। उसके पास इन दोनों कंपनियों के करार के मुताबिक डोज निर्यात करनी है। करोड़ों डोज के आर्डर उसके पास पिछले साल से हैं।
कोई भी कंपनी बाजार में मांग के अनुरूप उत्पादन बढ़ाती है। लेकिन, केंद्र सरकार ने उसे वैक्सीन बनाने का ऑर्डर जनवरी में दिया। एक करोड़ दस लाख डोज का। फिर 11 करोड़ का। याद करिए कि केंद्र सरकार ने पहले ही तीस करोड़ लोगों को वैक्सीन देने की घोषणा कर दी थी। दो खुराक यानी 60 करोड़ डोज की जरूरत थी। जबर्दस्त धूमधाम से शुरू हुआ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान। लेकिन, ऑर्डर जरूरत के मुताबिक आधी डोज का भी नहीं। ऐसा क्यों?
ऐसा नहीं कि वैक्सीन बनाने वाली दूसरी कंपनी भारत बॉयोटेक को 60 करोड़ में से बची डोज का ऑर्डर दे दिया गया। इस कंपनी की तो उत्पादन क्षमता ही काफी कम थी। तकरीबन दो करोड़ डोज की। तो क्या समझा जाए कि देश के हुक्मरानों को देश की आबादी का कोई अंदाज नहीं था? 135 करोड़ की आबादी वाले देश में 18 पार वाले कोई 85-90 करोड़ लोग हैं। एक मशहूर विदेशी दवा कंपनी ने भारत में इमरजेंसी प्रावधान के तहत मंजूरी के लिए दिसंबर में आवेदन किया था। लेकिन, उसे मंजूरी नहीं दी गई। आपको याद दिला दें कि दुनिया की सभी वैक्सीन को अभी इमरजेंसी प्रावधान के तहत मंजूरी मिली हुई है।
हाल में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया है। इसके मुताबिक एसआईआई को 1732.5 करोड़ और भारत बॉयोटेक को 787.5 करोड़ अग्रिम भुगतान 28 अप्रैल को किया गया। एसआईआई को इसके तहत आने वाले तीन महीनों मई, जून और जुलाई में 11 करोड़ डोज और भारत बॉयोटेक को तीन महीनों में पांच करोड़ डोज देनी है। यानी कुल मिलाकर 16 करोड़ डोज। इस बीच स्पूतनिक-वी की 60 लाख से ज्यादा डोज आयात मई में कर ली जाएगी।
माह कोविशील्ड कोवैक्सीन स्पूतनिक
जुलाई 7 करोड़ 7.5 करोड़ 2.5 करोड़
अगस्त 10 करोड़ 7.7 करोड़ 1.6 करोड़
सितम्बर -दिसंबर 11.5 करोड़ 10.2 करोड़ (अक्तूबर में) 7 करोड़
अब तस्वीर साफ होती है। यानी सरकार के पास लोगों को देने के लिए पर्याप्त वैक्सीन ही नहीं है। तो तमाम टीकाकरण केंद्र तो बंद होने ही हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बार-बार के दावे की सच्चाई की कलई अपने आप ही खुल जाती है।
दरअसल, हाल में महामारी से निपटने में सरकार ने आनन-फानन में कई ऐसी घोषणाएं कीं जो जमीनी सच्चाइयों से दूर हैं। जैसे, वैक्सीनेशन पॉलिसी की घोषणा। पहले सब केंद्रित रखा। बाद में बदलाव किए। इसने समस्या के हल से ज्यादा सवाल खड़े किए। मसलन, वैक्सीन की कीमत अपने लिए 150 और राज्यों के लिए अलग। निजी अस्पतालों के लिए अलग। यह समझ से परे है कि केंद्र और राज्यों के लिए दो अलग कीमतें। क्या देश के हुक्मरानों को यह पता नहीं है कि वॉलमार्ट, एमेजॉन, होलसेलर मेट्रो थोक में ज्यादा सामान इसलिए खरीदते हैं कि उत्पाद की कीमत वे अपने मुताबिक तय कर सकें? केंद्र देश भर के लिए वैक्सीन की खरीदारी खुद करता तो कीमत कम होती।
अब केंद्र सरकार ने राज्यों को सीधे निर्माता कंपनियों से बात करने का अधिकार दिया है। यह अलग बात है कि पचास फीसद राज्यों की हिस्सेदारी में आधी प्राइवेट अस्पतालों की भी होगी। काबिलेगौर है कि मेट्रो शहरों के बड़े कॉरपोरेट अस्पताल तो वैक्सीन की खरीदारी कर लेंगे। छोटे शहरों के अस्पतालों और नर्सिंग होम का क्या? क्या उनकी सुनवाई निर्माता कंपनियां करेंगी? वैक्सीन का टोटा रहेगा तो क्या साधन-संपन्न लोग बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों का रुख नहीं करेंगे? यह मत भूलिए कि यह वही अस्पताल हैं जो इलाज पर भारी भरकम बिल बनाने में कोई मुरव्वत नहीं करते हैं। अभी काफी अस्पतालों की टीकाकरण में भागीदारी थी। इसे एक झटके में खत्म कर दिया गया। क्यों?
टीयर-2 और टीयर-3 शहरों में भी इलाज के लिए बीमार निजी अस्पतालों का ही रुख करते हैं। ऐसी जगह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल किसी से छिपा नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का मानक है कि प्रति एक हजार की आबादी पर तीन नर्स और एक डॉक्टर होने चाहिए। लेकिन, भारत में प्रति हजार की आबादी पर 1.7 नर्स और 1404 की आबादी पर एक डॉक्टर है। शहरी क्षेत्रों में तो स्थितियां थोड़ी बेहतर हैं। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्रों में स्थितियां खराब हैं। इसमें जल्द सुधार की जरूरत है।
वेंटीलेटर की तरह ही अन्य जांचों के लिए उपकरण तो देर सबेर खरीदे जा सकते हैं। लेकिन, अहम मुद्दा उपकरणों को चलाने वाले तकनीकी कर्मचारी की भर्ती का भी है। कोरोना की जांच के लिए आरटी पीसीआर टेस्ट किट की अब भी किल्लत है। अप्रैल माह में रिपोर्ट के लिए लोगों को कई कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा। देश की राजधानी दिल्ली में तो रिपोर्ट तो छोड़िए, टेस्ट कराने के लिए भी लोगों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ गया था। याद करिए कि ऐसे ही हालात एक साल पहले भी थे।
एक और पेचीदा मामला छोटे शहरों में बिजली की उपलब्धता का भी है। तमाम शहरों में हाल के वर्षों में सुधार हुआ है। लेकिन, चंद मिनटों का गायब होना क्या गुल खिला सकता है? आजकल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की चर्चा खूब है। इसे अनवरत बिजली चाहिए। अन्यथा जरा सा व्यवधान मरीज की जान पर बन आएगा। यह वातावरण से नाइट्रोजन हटाकर ऑक्सीजन नहीं दे सकेगा। यानी बंद हो जाएगा। क्या टीयर-2 और टीयर-3 शहरों में बिजली न जाने का पक्का वादा किया जा सकता है? इस महामारी में मरीज को सबसे ज्यादा ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है। ऑक्सीजन प्लांट लगाने की घोषणाओं का भी जमीन पर साकार होना बेहद जरूरी है।
बहरहाल, वैक्सीन का टोटा तो दो-तीन महीने में खत्म होने के आसार हैं। लेकिन, ‘हर्ड इम्युनिटी’ हासिल करने के लिए देश की सत्तर प्रतिशत आबादी का टीकाकरण आसान नहीं हैं। दुआ करें कि इस बार सरकार दो अरब से ज्यादा डोज मुहैया कराने का वादा जरूर निभाए। अन्यथा यह सत्ता के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। वैसे भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट की खबरें आम होने लगी हैं। सरकार की साख पर सवाल है।
ग्लोबल टेंडर किसी काम का नहीं
केंद्र सरकार को खुद खरीदने में दिक्कत क्या है? बजट में इस मद में 35 हजार करोड़ रुपए आवंटन किया गया है। 18 पार वाले 90 करोड़ लोगों की दो डोज यानी 180 करोड़ को 150 रुपए से गुणा करने पर सिर्फ 27 हजार करोड़ रुपए बैठते हैं। अलग- अलग राज्य देशी कंपनियों से भी खरीदारी करेंगे तो लॉजिस्टिक का खर्च बढे़गा। राज्य तो वैसे भी राजधानी से जिला मुख्यालय तक वैक्सीन पहुंचाने का खर्च उठा ही रहे थे।
अब केंद्र सरकार क्या करेगी? नीति आयोग के सदस्य डॉक्टर वी के पॉल का कहना है कि विदेशी कंपनियों से भी देश में वैक्सीन उत्पादन करने को कहा जा रहा है। वहां निर्मित वैक्सीन आयात भी की जा सकती है। लेकिन, मॉडर्ना, फाइजर जैसी कंपनियों ने साफ कह दिया है कि उनके पास इस सिलसिले में बात करने का साल की तीसरी तिमाही तक समय नहीं है। जाहिर है उनकी ऑर्डर बुक पहले से ही भरी हुई है। अमेरिका के पास छह करोड़ डोज अतिरिक्त है। वह कई देशों को देने की हामी भर चुका है। शायद उसमें से कुछ हिस्सा भारत को भी मिल जाए।
मंजूरी लेने में की लेटलतीफी
कोवैक्सीन निर्माता बॉयोटेक ने मंजूरी के लिए 19 अप्रैल को अपने अध्ययन का ब्योरा डब्ल्यूएचओ को सौंपा है। कंपनी के मुताबिक अभी भी आवश्यक सभी आंकड़े सौंपे नहीं जा सके हैं। कोई दस फीसदी ब्योरा मंजूरी के लिए और दिए जाने की जरूरत है। इसे डब्ल्यूएचओ से औपचारिक मंजूरी मिलने में एक-दो माह का समय लग सकता है। सवाल उठता है कि भारत में जनवरी में ही मंजूरी मिल जाने के बाद आंकड़े देर से क्यों जमा किए गए?
यही नहीं, अमेरिकी रेग्युलेटर एफडीए से भी इमरजेंसी मंजूरी नहीं मिली है। अक्सर देखा गया है कि एफडीए से मंजूरी मिलने के बाद कई देश समय बचाने के लिए वैक्सीन को मंजूरी दे देते हैं। भारत में भी जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कई और कंपनियों को महामारी के मद्देनजर मंजूरी देने को पत्र लिखा था, तब भी प्रोटोकाल को न मानते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने पत्र में उठाए गए मुद्दों पर नुक्ताचीनी की थी। हालांकि, बाद में डब्ल्यूएचओ और एफडीए से इमरजेंसी मंजूरी पाई और वैक्सीन को भारत में भी मंजूरी देने की बात कही थी।
ग्रामीण क्षेत्रों में रजिस्ट्रेशन की बाध्यता
आजकल तो दिनभर स्मार्ट फोन चलाने वाले शहरी लोगों के ही रजिस्ट्रेशन कराने में पसीने छूट जाते हैं। चंद मिनटों में स्लॉट कार जाता है। तो ग्रामीण इलाकों में क्या स्थितियां होंगी इसकी कल्पना ही की जा सकती है। आखिर एक सवाल तो बनता है कि प्रक्रिया आसान बनाने में क्या दिक्कत है?
वैक्सीन की दोगुनी कीमत की वसूली
यह समझ से परे है कि सरकार स्टेंट, घुटनों के कैप या दिल के ऑपरेशन की प्रक्रिया की कीमत निर्धारित कर सकती है। लेकिन, न तो वैक्सीन की कीमत तय करना चाह रही है, और न ही लगाने की कीमत। ऐसा क्यों?