हरिद्वार में 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का आगाज, राज्यपाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर दिया जोर
राज्यपाल ने कहा कि प्राच्यविद्या का अध्ययन भारतीय सभ्यता के विकास, विभिन्न विचारधाराओं के संवाद और मानव समाज के बौद्धिक इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भारतीय दर्शन के ग्रंथों में जीवन मूल्यों, नैतिकता, कर्तव्य और सामाजिक समरसता से जुड़े अनेक विचार समाहित हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर जोर दिया जा रहा है। ‘विकास भी, विरासत भी’ का विचार आधुनिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखने की भावना को दर्शाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषाओं, बहुविषयक शिक्षा और अनुसंधान को महत्व दिया गया है।
राज्यपाल ने ज्ञान भारतम् मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण आवश्यक है। इन पांडुलिपियों में भारत की सभ्यता और बौद्धिक उपलब्धियों का महत्वपूर्ण ज्ञान संचित है। इसे सुरक्षित रखकर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने युवा शोधार्थियों से प्राचीन ग्रंथों के मूल पाठ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दार्शनिक विचारों का गहन अध्ययन करने का आह्वान किया। साथ ही शोध में स्रोतों की प्रामाणिकता, निष्कर्षों की पारदर्शिता और बौद्धिक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर बल दिया।
इस अवसर पर राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रकाशनों का लोकार्पण भी किया। कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव, कुलपति आचार्य बालकृष्ण, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी सहित अनेक विद्वान, आचार्य और शोधार्थी उपस्थित रहे।
