नई दिल्ली, 29 सितंबर । 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम रोक नहीं मिली है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अधिवक्ता अंजन दत्ता की याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि मामला कानूनी पहलू के साथ-साथ तकनीकी प्रकृति का भी है। याचिका में यूपीआई लेनदेन पर MDR लगाने के लिए अपनाई गई व्यवस्था और उसके कानूनी आधार को चुनौती दी गई है।
नए ढांचे के तहत 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के सामान्य पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू किया जाना है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है। वहीं, पर्सन-टू-पर्सन (P2P) यूपीआई ट्रांसफर पहले की तरह शुल्क मुक्त रहेगा।
केंद्र सरकार ने सुनवाई के दौरान अदालत को बताया कि प्रस्तावित व्यवस्था के बावजूद करीब 96 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे। सरकार के मुताबिक, आवश्यक सेवाओं से जुड़े कुछ लेनदेन के लिए अलग सीमा निर्धारित की गई है। MDR से प्राप्त राशि यूपीआई इकोसिस्टम में शामिल बैंकों और अन्य संबंधित संस्थाओं के बीच वितरित की जाएगी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि शुल्क लगाने की व्यवस्था पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू की गई है। याचिका में भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाया गया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने MDR व्यवस्था पर रोक नहीं लगाई है। अब केंद्र, RBI और NPCI के जवाब के बाद मामले की आगे सुनवाई होगी।