देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सीमांत जिलों में प्रस्तावित कैबिनेट बैठकों को लेकर राज्य सरकार से पिछले साढ़े नौ वर्षों का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्र केवल चुनावी दौरों या बैठकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पलायन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से सीधे जुड़े हुए हैं।
दसौनी ने कहा कि चुनाव नजदीक आने के साथ सरकार को सीमांत जिलों की याद आई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सीमांत क्षेत्रों में प्रसूताओं, बुजुर्गों और मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण दांडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता था, तब सरकार ने इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए क्या कदम उठाए।
उन्होंने कहा कि सीमांत गांवों में जंगली जानवरों का आतंक, रोजगार के सीमित अवसर, सड़क और संचार सुविधाओं की कमी तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों के कारण पलायन की समस्या बनी हुई है। ऐसे में केवल किसी सीमांत जिले में कैबिनेट बैठक आयोजित करने से वहां की समस्याओं का समाधान नहीं होगा।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, सड़क और शिक्षा की व्यवस्था तथा मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना जरूरी है। उन्होंने सरकार से सीमांत क्षेत्रों के लिए पिछले वर्षों में की गई घोषणाओं और उन पर हुई कार्रवाई की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की।
दसौनी ने जनवरी 2026 में राज्य सरकार और आईटीबीपी के बीच ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ के तहत 108 सीमांत गांवों को लेकर हुए समझौते की वर्तमान स्थिति भी सार्वजनिक करने को कहा। उन्होंने पूछा कि इस अभियान के तहत अब तक कितने गांवों को वास्तविक लाभ मिला और कितने कार्य पूरे किए गए।
उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्रों के लोग अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर परिणाम चाहते हैं। दसौनी ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की कि सीमांत जिलों में प्रस्तावित कैबिनेट बैठकें विकास संबंधी फैसलों के लिए हैं या 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों का हिस्सा।