सरकारी डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस की छूट, मरीजों को सस्ता इलाज मिलेगा या बढ़ेगी परेशानी?

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। सरकारी चिकित्सकों पर लागू निजी प्रैक्टिस के प्रतिबंध को हटाने का प्रस्ताव सामने आया है। नए नियम लागू होने के बाद सरकारी डॉक्टर अपनी नियमित ड्यूटी पूरी करने के बाद निजी क्लिनिक या अस्पतालों में मरीजों का इलाज कर सकेंगे। सरकार का उद्देश्य विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ मरीजों को अपेक्षाकृत कम शुल्क में उपचार उपलब्ध कराना बताया जा रहा है।

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को मिलने की उम्मीद है। इन क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण लोगों को इलाज के लिए देहरादून, हल्द्वानी या दिल्ली जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है। यदि सरकारी विशेषज्ञ डॉक्टर ड्यूटी के बाद स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होते हैं तो मरीजों को लंबी दूरी तय करने और अतिरिक्त खर्च से राहत मिल सकती है।

सरकार का यह भी मानना है कि निजी प्रैक्टिस की अनुमति मिलने से सरकारी चिकित्सकों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा। इससे विशेषज्ञ डॉक्टरों के सरकारी सेवा छोड़कर निजी क्षेत्र में जाने की प्रवृत्ति को रोकने में मदद मिल सकती है। साथ ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद विशेषज्ञता और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।

हालांकि, इस फैसले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता सरकारी ड्यूटी के प्रभावित होने की है। आशंका है कि निजी प्रैक्टिस के कारण सरकारी अस्पतालों की ओपीडी और आपातकालीन सेवाओं पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा मरीजों को निजी क्लिनिक की ओर रेफर करने, महंगी जांच या दवाओं की सलाह देने जैसी शिकायतों की निगरानी भी चुनौती बन सकती है।

एक अन्य सवाल निजी प्रैक्टिस की फीस को लेकर है। सरकार कम शुल्क की बात कर रही है, लेकिन इसकी सीमा कौन तय करेगा और नियमों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई होगी, यह स्पष्ट होना जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक नीति को सफल बनाने के लिए पारदर्शी फीस व्यवस्था, कड़ी निगरानी और सरकारी अस्पतालों में स्टाफ की कमी दूर करना बेहद जरूरी होगा।

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