नई दिल्ली। नीरज चोपड़ा की टोक्यो ओलंपिक में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीत ने भारतीय एथलेटिक्स में भाला फेंक को नई पहचान दिलाई। उनकी सफलता से प्रेरित होकर देश के कई युवाओं ने इस खेल को करियर के तौर पर अपनाया। झारखंड के गुमला जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली 17 वर्षीय शिल्पा कुमारी भी उन्हीं खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने नीरज की जीत देखकर ओलंपिक पदक का सपना देखा।
किसान परिवार से आने वाली शिल्पा ने भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के रांची केंद्र में प्रशिक्षण शुरू किया। आज वह महिला अंडर-17 भाला फेंक की उभरती प्रतिभाओं में शामिल हैं। शिल्पा बताती हैं कि उन्होंने गांव की चौपाल में पड़ोसियों के साथ टीवी पर नीरज चोपड़ा को ओलंपिक स्वर्ण जीतते देखा था। उस पल ने उनके मन में भाला फेंक को लेकर जुनून पैदा किया।
शिल्पा ने कहा कि नीरज की जीत के बाद उन्होंने तय कर लिया था कि वह भी देश के लिए ओलंपिक पदक जीतेंगी। उनका सपना अब सिर्फ शुरुआत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं।
रांची के साई केंद्र में करीब तीन साल पहले हुए एथलेटिक्स ट्रायल के दौरान कोच बिनोद सिंह ने उनकी प्रतिभा पहचानी थी। कोच के मुताबिक, शिल्पा शुरुआत में इस खेल के बारे में ज्यादा नहीं जानती थीं, लेकिन उनकी प्राकृतिक प्रतिभा और मजबूत थ्रो ने उन्हें प्रभावित किया। प्रशिक्षण के दौरान शिल्पा ने तेजी से सुधार किया।
2025 में 69वें राष्ट्रीय स्कूल खेलों में शिल्पा ने 55.62 मीटर की थ्रो कर सुर्खियां बटोरीं। यह प्रदर्शन अंडर-18 के 55.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से भी बेहतर था। हालांकि प्रतियोगिता को विश्व एथलेटिक्स की आधिकारिक मान्यता नहीं होने के कारण एएफआई ने इसे आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं माना। उनकी आधिकारिक व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो 45.90 मीटर है।
आर्थिक चुनौतियों के बावजूद शिल्पा का परिवार उनके सपने के साथ खड़ा है। साई की प्रशिक्षण, उपकरण और आहार जैसी सुविधाओं ने उनके खेल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अब शिल्पा की नजर 31 अक्टूबर से 13 नवंबर 2026 तक डकार, सेनेगल में होने वाले युवा ओलंपिक पर है। उनका पहला लक्ष्य वहां पोडियम पर पहुंचना है, जबकि अंतिम सपना ओलंपिक पदक जीतना है। शिल्पा का कहना है कि अगर वह ओलंपिक पदक जीतती हैं तो उसे नीरज चोपड़ा को समर्पित करेंगी।