देहरादून। नंदा की चौकी स्थित टौंस नदी के पुल की एप्रोच रोड पहली बड़ी बारिश में धंसने के बाद उत्तराखंड में सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से पुनर्निर्मित पुल पर 12 जुलाई से यातायात शुरू हुआ था, लेकिन 28 जुलाई को इसकी एप्रोच रोड में बड़ा धंसाव सामने आया। प्रशासन ने भी घटना की पुष्टि की है।
उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने इस मामले को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए परियोजना की गुणवत्ता, टेंडर प्रक्रिया और संबंधित फर्मों की हिस्सेदारी को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि एप्रोच रोड का महज करीब 16 दिनों में धंस जाना सामान्य घटना नहीं है। यह निर्माण कार्य की गुणवत्ता, तकनीकी जांच और निगरानी व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
दसौनी ने कहा कि इस पूरे मामले में सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज ठेकेदार फर्मों और उनके साझेदारों से जुड़ी जानकारी भी सामने आई है। उनके मुताबिक उपलब्ध दस्तावेजों में M/s Himalayan Construction को पार्टनरशिप फर्म बताया गया है। इसमें रुचि भट्ट की 25 प्रतिशत, नितिन कुमार गर्ग की 50 प्रतिशत और अखिलेश कुमार भट्ट की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज होने का दावा किया गया है। वहीं, अन्य उपलब्ध दस्तावेजों में M/s Doon Associates में अरविंद कुमार भट्ट की 50 प्रतिशत, अरविंद कुमार गर्ग की 30 प्रतिशत और वैभव गर्ग की 20 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्शाए जाने की बात कही गई है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इन दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का दावा नहीं किया जा रहा है। उनका कहना है कि जब करोड़ों रुपये की सरकारी परियोजना की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हों और दस्तावेजों में सत्तारूढ़ भाजपा की प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष से जुड़ी हिस्सेदारी का उल्लेख सामने आए, तो पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दसौनी ने भाजपा नेतृत्व और संबंधित पक्षों से सात प्रमुख सवालों का जवाब मांगा है। उन्होंने पूछा कि क्या M/s Himalayan Construction में रुचि भट्ट की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी वास्तव में है? यदि सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज जानकारी गलत है तो भाजपा और रुचि भट्ट को इसका स्पष्ट खंडन करना चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि हिस्सेदारी सही है तो क्या राजनीतिक पद को देखते हुए संभावित हितों के टकराव की जानकारी पार्टी या संबंधित विभाग को दी गई थी।
उन्होंने सरकार से यह भी बताने को कहा कि नंदा की चौकी की करीब 16 करोड़ रुपये की परियोजना का ठेका किस फर्म को मिला, किस प्रक्रिया के तहत मिला और पूरी टेंडर प्रक्रिया क्या थी। इसके अलावा परियोजना शुरू होने से पहले डिजाइन, मिट्टी की जांच, एप्रोच रोड, ड्रेनेज और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता का तकनीकी परीक्षण किस स्तर पर किया गया था।
दसौनी ने सवाल उठाया कि पुल को जनता के लिए खोलने से पहले किस अधिकारी या तकनीकी एजेंसी ने निर्माण को सुरक्षित और उपयोग योग्य घोषित किया था। उन्होंने यह भी पूछा कि महज करीब 16 दिन में एप्रोच रोड धंसने की जिम्मेदारी किसकी तय होगी और दोष सामने आने पर संबंधित ठेकेदार तथा अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
कांग्रेस ने सरकार से पूरे टेंडर, वर्क ऑर्डर, भुगतान, गुणवत्ता परीक्षण और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है। दसौनी ने कहा कि इससे जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा कि परियोजना में किस स्तर पर निर्णय लिए गए और निर्माण कार्य की निगरानी कैसे हुई।
उन्होंने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा अक्सर कांग्रेस पर परिवारवाद और भाई-भतीजावाद के आरोप लगाती रही है। अब भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी सरकार में सरकारी ठेके योग्यता और पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर दिए जा रहे हैं या सत्ता और संगठन से जुड़े लोगों को किसी प्रकार का लाभ मिल रहा है।
दसौनी ने कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी से जुड़ी फर्म सरकारी परियोजनाओं में ठेका हासिल करती है तो हितों के टकराव और पारदर्शिता के सवालों का जवाब देना जरूरी है। उन्होंने पूछा कि क्या राजनीतिक पदों पर रहने वाली महिला नेताओं या उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों को सरकारी ठेकों में विशेष अवसर मिल रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो भाजपा नेतृत्व को पूरी टेंडर प्रक्रिया सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी किसी व्यक्ति के निजी व्यवसाय या संपत्ति रखने के अधिकार पर सवाल नहीं उठा रही है। मुद्दा यह है कि सरकारी धन से संचालित परियोजनाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और हितों के टकराव से जुड़े नियमों का पालन हुआ या नहीं।
उन्होंने नंदा की चौकी परियोजना की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराने की मांग की। उनके अनुसार जांच केवल एप्रोच रोड की मरम्मत तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि सड़क के नीचे की मिट्टी क्यों बही, ड्रेनेज व्यवस्था कैसी थी और निर्माण में निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन किया गया या नहीं।
दसौनी ने कहा कि उत्तराखंड में भारी बारिश एक वास्तविकता है और इसे निर्माण की गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यदि निर्माण मानकों के अनुरूप हुआ है तो स्वतंत्र जांच में स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन यदि लापरवाही सामने आती है तो जनता के पैसे की वसूली और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि 16 करोड़ रुपये जनता के टैक्स का पैसा है। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसका पैसा किसे, किस प्रक्रिया से और किस गुणवत्ता के काम के लिए दिया गया। उन्होंने भाजपा नेतृत्व और रुचि भट्ट से आरोपों पर राजनीतिक बयानबाजी के बजाय दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।