नई दिल्ली। यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है, जहां लगातार पड़ रही रिकॉर्डतोड़ हीटवेव ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (ECDC) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) समर्थित नेटवर्क यूरोमोमो (EuroMOMO) के आंकड़ों के अनुसार, इस भीषण गर्मी के कारण अब तक 10 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें करीब 9 हजार मृतकों की उम्र 65 वर्ष से अधिक बताई गई है, जबकि अकेले यूनाइटेड किंगडम (यूके) में 2,700 से ज्यादा लोगों की जान गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप में लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च तापमान का सबसे अधिक असर बुजुर्गों, बीमार लोगों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर पड़ रहा है। लगातार बढ़ती मौतों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर यूरोप को इस भीषण गर्मी से राहत कब मिलेगी।
दूसरी ओर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय हो चुका है और देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश के कारण लोगों को गर्मी से राहत मिली है। हालांकि यूरोप में भारतीय मानसून जैसी कोई मौसम प्रणाली नहीं होती। विश्व मौसम संगठन (WMO) के अनुसार, जुलाई से सितंबर के बीच अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी और नम हवाएं यूरोप के कई क्षेत्रों में बारिश लेकर आती हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन हवाओं से तापमान में गिरावट आती है, लेकिन इस बार इनका प्रभाव कमजोर रहने से गर्मी का प्रकोप जारी है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यूरोप में जिसे कई बार स्थानीय तौर पर ‘यूरोपीय मानसून’ कहा जाता है, वह वास्तव में भारत की तरह का मानसून नहीं है। यह केवल अटलांटिक महासागर से आने वाली ठंडी और नमी वाली पछुआ हवाएं होती हैं, जो बारिश के बाद तापमान को कम करने में मदद करती हैं। फिलहाल इन हवाओं का असर सीमित रहने के कारण यूरोप के अधिकांश हिस्सों में गर्मी से राहत मिलने के आसार कम नजर आ रहे हैं।