काठमांडू। नेपाल सरकार प्रशासनिक सुधार के नाम पर बड़े पैमाने पर सरकारी कर्मचारियों की समयपूर्व सेवानिवृत्ति की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर चपरासी से लेकर सचिव स्तर तक करीब 18 हजार कर्मचारियों को एक साथ सेवा से विदा किया जा सकता है। इस योजना ने सरकारी तंत्र के भीतर हलचल पैदा कर दी है और इसके वित्तीय प्रभावों को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
सरकार अध्यादेश के माध्यम से ऐसा कानूनी प्रावधान लाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत 55 वर्ष की आयु पूरी कर चुके या 30 वर्ष की सेवा अवधि पूरी करने वाले कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से अवकाश दिया जाएगा। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो वर्तमान में कार्यरत बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारी प्रभावित होंगे और केवल सीमित संख्या में सचिव पद पर बने रह पाएंगे।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 55 वर्ष की आयु सीमा और 30 वर्ष की सेवा अवधि के प्रावधानों के कारण सचिव, सहसचिव, उपसचिव और अन्य राजपत्रित अधिकारियों सहित हजारों कर्मचारी समय से पहले सेवा से बाहर हो सकते हैं। सहसचिव स्तर के करीब 180 अधिकारी आयु सीमा के कारण प्रभावित होंगे, जबकि 88 अधिकारी 30 वर्ष की सेवा पूरी करने के आधार पर सेवानिवृत्त किए जा सकते हैं। इसी तरह उपसचिव और शाखा अधिकृत स्तर के भी बड़ी संख्या में कर्मचारी इस दायरे में आएंगे।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खरिदार से मुख्य सचिव स्तर तक 7,000 से अधिक कर्मचारी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। सरकार जुलाई के अंत से इस व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना बना रही है। शुरुआती चरण में प्रभावी सेवानिवृत्ति आयु सीमा को पहले 59 वर्ष और बाद में 60 वर्ष तक बनाए रखने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है।
हालांकि, वित्त मंत्रालय ने इस योजना पर चिंता जताई है। मंत्रालय का कहना है कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों को एकमुश्त सेवानिवृत्त करने से सरकार पर लगभग 25 अरब नेपाली रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इसके बावजूद संघीय मामलों और कानून मंत्रालय के स्तर पर इस योजना को आगे बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। आने वाले दिनों में इस प्रस्ताव को लेकर नेपाल की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में बहस और तेज होने की संभावना है।