गणेश का राजनीतिक उभार प्रदेश में एक वैकल्पिक और सशक्त नेतृत्व की दस्तक
मिशन 2027: उधार के पत्थरों पर टिकी भाजपा की नई धुरंधर चुनावी घेराबंदी
भाजपा के 47 विधायक, फिर भी मंत्रिमंडल में ‘बाहरी’ बागियों का बोलबाला क्यों?
कांग्रेसी ट्रेनिंग से निखरा बागी नेताओं का रणनीतिक कौशल भाजपा पर पड़ रहा भारी
अमर नाथ सिंह, देहरादून।
उत्तराखंड की राजनीति के मुख्य केंद्र और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ हुई हालिया बातचीत के बाद राज्य के राजनीतिक हलकों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। इस बातचीत की अगली कड़ी के रूप में जो बातें सामने आई हैं, वे न केवल कांग्रेस की भविष्य की योजना की ओर इशारा करती हैं, बल्कि सत्ताधारी दल भाजपा के भीतर संगठन की चुनौतियों को भी एक नए नजरिए से पेश करती हैं। हरीश रावत ने बड़ी ही बेबाकी और भरोसे के साथ गणेश गोदियाल को उत्तराखंड कांग्रेस के एक ऐसे चमकते हुए सितारे के रूप में पेश किया है, जो आने वाले समय में न केवल पार्टी का मुख्य चेहरा होंगे, बल्कि भाजपा के मजबूत माने जाने वाले किलों को तोड़ने की ताकत भी रखते हैं।
रावत विशेष रूप से पिछले लोकसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक तरफ मोदी लहर और दूसरी ओर संसाधनों व धन की भारी कमी के बावजूद गोदियाल ने जिस हिम्मत से अनिल बलूनी जैसे बड़े नेता को कड़ी टक्कर दी, उसने कांग्रेस के गौरवशाली और संघर्षपूर्ण इतिहास की याद ताजा कर दी है। रावत की नजर में गोदियाल का यह प्रदर्शन केवल एक चुनावी हार-जीत का आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह उनके उस गहरे पहाड़ प्रेम और जनता से जुड़ाव का सबूत था, जो उन्हें लोगों की नजरों में एक स्वाभाविक जननेता के रूप में स्थापित करता है। उनका मानना है कि गणेश गोदियाल का राजनीति में उभरना प्रदेश में एक मजबूत नेतृत्व की वह आहट है, जो आने वाले समय में भाजपा की चुनावी मशीनरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनेगी।
पूर्व मुख्यमंत्री इस बात पर जोर देते हैं कि गोदियाल में वह कुदरती नेतृत्व क्षमता है जो पहाड़ की पहचान और वहां के युवाओं की उम्मीदों को आवाज दे सकती है। अंकिता भंडारी मामले से लेकर भर्ती घोटालों और हालिया बजट की कमियों तक, जिस प्रकार उन्होंने जमीन पर उतरकर संघर्ष की कमान संभाली, उसने कांग्रेस के शांत पड़े कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी है। रावत के अनुसार, गोदियाल केवल एक राजनेता नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए वह ‘सुरक्षा कवच’ हैं, जो भाजपा के भारी-भरकम बजट और ‘धुरंधर’ मुख्यमंत्री के प्रचार को अपने सादगी भरे पहाड़ी अंदाज और सटीक प्रहारों से बेअसर कर सकते हैं। वे साफ तौर पर देखते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में गोदियाल का चेहरा कांग्रेस के लिए नई जान फूंकने वाला साबित होगा, क्योंकि उनके पास जनता की नब्ज पहचानने का हुनर और सरकार को हर मोर्चे पर घेरने का साहस है।
इसी बातचीत के दौरान भाजपा के भीतर चल रही खींचतान और हाल के मंत्रिमंडल विस्तार पर भी हरीश रावत ने बहुत ही सटीक बात कही। वे सवाल उठाते हैं कि भाजपा के पास जब 47 विधायकों की बड़ी टीम है, जिनमें से ज्यादातर पार्टी के पुराने और वफादार कार्यकर्ता हैं, तो फिर क्या कारण है कि भाजपा आलाकमान आज भी कांग्रेस से अलग होकर आए नेताओं पर ही सबसे अधिक दांव लगा रहा है? रावत इस स्थिति को ‘भाजपा का कांग्रेसीकरण’ कहते हुए बताते हैं कि सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, रेखा आर्य और सौरभ बहुगुणा जैसे पुराने चेहरों के बाद अब प्रदीप बत्रा और राम सिंह कैड़ा जैसे मंत्रियों की मौजूदगी यह दिखाती है कि भाजपा के भीतर नेतृत्व का बड़ा संकट है।
भरोसेमंद सूत्रों और रावत के अनुभवों से यह बात निकल कर आती है कि भाजपा अपने पुराने विधायकों पर भरोसा इसलिए नहीं कर पा रही है क्योंकि उनके पास वह चुनावी रणनीति और जमीनी आधार नहीं है, जो कांग्रेस से आए नेताओं की पहचान है। रावत तंज कसते हुए कहते हैं कि कांग्रेस और उसके संगठन ने अपने नेताओं को चुनाव लड़ने और जनता के बीच जगह बनाने की पूर्व में जो तैयारी करवाई है, वह इतनी मजबूत है कि भाजपा को अपनी चुनावी नैया पार लगाने के लिए उन्हीं के कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है।
राजनीति के इस मंझे हुए खिलाड़ी ने एक गंभीर सुझाव देते हुए कहा कि भाजपा को अब अपने पुराने कार्यकर्ताओं में ‘नेतृत्व के गुण’ विकसित करने के लिए गंभीरता से काम करने की जरूरत है, वरना दूसरे दलों से आए चेहरों के भरोसे संगठन के मूल स्वरूप को बचाना नामुमकिन होगा। रावत की यह बात भाजपा के उन समर्पित कार्यकर्ताओं के दर्द को भी आवाज देती है, जो सालों की वफादारी के बाद भी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि जिस राजनीतिक घर की नींव ही ‘उधार के चेहरों’ पर टिकी हो, वह बाहर से भले ही कितना भी मजबूत दिखे, लेकिन अंदर से वह कमजोर होता जा रहा है।
कुल मिलाकर, हरीश रावत के साथ हुई इस चर्चा का सार यही है कि उत्तराखंड की राजनीति अब विचारों और चुनावी हुनर के युद्ध में बदल रही है। जहां एक ओर भाजपा अपने सरकारी रसूख और बजट के दम पर किला बचाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर गोदियाल के रूप में कांग्रेस सत्ता बदलने की नई कहानी लिखने की ताकत रखती है। भविष्य की यह जंग ‘धुरंधर’ बनाम ‘पहाड़ी जुझारूपन’ की होती दिख रही है।