भाजपा का ‘मिशन 2026’ और दिसपुर की दरार

पुराने कार्यकर्ताओं में ‘ओरिजिनल बनाम हाइब्रिड’ की छिड़ी तीखी जंग
सिद्धांतों पर भारी पड़ी ‘चुनावी इंजीनियरिंग’, कैडर की निष्ठा दांव पर
भीतरघात का बढ़ा खतरा, कांग्रेस ‘बाहरी’ मुद्दे पर बुन रही जाल

ममता सिंह, नई दिल्ली/गुवाहाटी।

दिसपुर विधानसभा सीट पर प्रद्युत बोरदोलोई को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर ‘संगठनात्मक निष्ठा’ और ‘चुनावी अनिवार्यता’ के बीच एक गहरा वैचारिक और रणनीतिक द्वंद्व उभरकर सामने आया है। भाजपा, जो खुद को काडर-आधारित और अनुशासित पार्टी मानती है, वहां बोरदोलोई जैसे कद्दावर कांग्रेसी चेहरे का महज 24 घंटे के भीतर ‘प्रवेश और टिकट’ मिलना पुराने कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी मानसिक और राजनीतिक चुनौती बन गया है। यह घटनाक्रम असम की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत दे रहा है, जहां पार्टी की पारंपरिक विचारधारा और जीत की व्यावहारिक राजनीति आमने-सामने हैं।
इस अंतर्विरोध का सबसे प्रखर रूप मौजूदा विधायक अतुल बोरा की प्रतिक्रिया में दिखाई देता है। साल 1985 से इस क्षेत्र की राजनीति के केंद्र में रहे बोरा और उनके समर्थकों का मानना है कि पार्टी ने उन कार्यकर्ताओं की दशकों की तपस्या को दरकिनार कर दिया है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस के गढ़ में कमल खिलाया था। भाजपा के भीतर एक बड़ा धड़ा अब इसे ‘ओरिजिनल बनाम की जंग के रूप में देख रहा है। पुराने स्वयंसेवकों और समर्पित कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ‘आयाराम-गयाराम’ की इस राजनीति से पार्टी की मूल वैचारिक शुद्धता प्रभावित होती है और लंबे समय से अपनी बारी का इंतजार कर रहे स्थानीय नेताओं का मनोबल टूटता है। उनके लिए यह केवल एक सीट का मुद्दा नहीं, बल्कि पार्टी के मूल चरित्र के बदलने का प्रश्न है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली ‘नई भाजपा’ इसे ‘चुनावी इंजीनियरिंग’ और ‘विस्तारवाद’ के चश्मे से देखती है। नेतृत्व का मानना है कि 2026 के आगामी कठिन चुनाव को जीतने के लिए केवल काडर की शक्ति पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रद्युत बोरदोलोई जैसे ‘मास लीडर’ की आवश्यकता है, जिनके पास अपना स्वतंत्र वोट बैंक, प्रशासनिक अनुभव और व्यापक जनसंपर्क है। भाजपा रणनीतिकारों का तर्क है कि बोरदोलोई का आगमन केवल एक सीट जीतना नहीं है, बल्कि विपक्षी कांग्रेस के मनोबल को पूरी तरह ध्वस्त करना है। यह ऊपरी असम के ‘चाय बागान’ और ‘मध्य असम’ के मतदाताओं को एक शक्तिशाली संदेश देने की कोशिश है कि कांग्रेस का अस्तित्व अब समाप्ति की ओर है।
हालांकि, इस रणनीतिक छलांग के बीच जमीनी स्तर पर ‘समन्वय’ की गंभीर चुनौती खड़ी है। दिसपुर के पन्ना प्रमुख और बूथ अध्यक्ष, जो कल तक बोरदोलोई की नीतियों और उनके राजनीतिक प्रभाव का पुरजोर विरोध कर रहे थे, अब रातों-रात उनके लिए समर्थन कैसे जुटाएंगे, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। राजनीति में वैचारिक बदलाव इतनी तेजी से नहीं आते जितनी तेजी से दल बदल लिए जाते हैं। यदि अतुल बोरा का खेमा भीतर से शांत नहीं हुआ, तो ‘भीतरघात’ का खतरा बोरदोलोई की राह को अत्यंत दुर्गम बना सकता है।
वहीं, गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस इस दरार का फायदा उठाने की ताक में है। कांग्रेस इस असंतोष को ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ के नैरेटिव में बदलकर भाजपा के कैडर को भ्रमित करने की कोशिश कर रही है। अंततः, दिसपुर का यह मुकाबला केवल एक सीट का परिणाम नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि क्या भाजपा का ‘मशीन जैसा संगठन’ अपने शीर्ष नेतृत्व के हर फैसले को बिना किसी हिचकिचाहट के आत्मसात कर पाने में सक्षम है, या फिर जमीनी कार्यकर्ताओं का विद्रोह पार्टी की रणनीति पर भारी पड़ेगा।

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