आंदोलनकारियों के अनुसार, 27 सितंबर को लालकुआं में वन अधिकार संगठन के बैनर तले हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया था। इस दौरान मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा ने 10 दिन के भीतर राज्य सरकार की उच्चस्तरीय बैठक कराकर समस्या के समाधान का आश्वासन दिया था। इसके बाद प्रस्तावित आंदोलन स्थगित कर दिया गया, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी है।
वन अधिकार संगठन के अध्यक्ष उमेश चंद्र भट्ट ने कहा कि बिंदुखत्ता के मामले में शासन-प्रशासन का रवैया लगातार निराशाजनक रहा है। जिला स्तरीय वन अधिकार समिति ने अधिसूचना जारी करने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा था, लेकिन दो वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद निर्णय नहीं हुआ। इसके उलट पत्रावली वापस भेज दी गई, जो क्षेत्रवासियों के साथ अन्याय है।
वन अधिकार समिति के अध्यक्ष अर्जुन नाथ कोस्वामी ने कहा कि देश में 1700 से अधिक गांवों को राजस्व गांव का दर्जा मिल चुका है। इसके बावजूद आजादी से पहले बसे बिंदुखत्ता के लोगों को आवश्यक दस्तावेज पूरे होने के बाद भी अधिकार नहीं मिल पाए हैं।
पूर्व सैनिक संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि राजस्व गांव का दर्जा मिलना क्षेत्र के बच्चों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। वर्तमान व्यवस्था में लोगों के पास जमीन पर अपना अधिकार साबित करने के लिए पर्याप्त राजस्व दस्तावेज नहीं हैं। ग्राम सभा की व्यवस्था नहीं होने से भी क्षेत्र के विकास में बाधाएं आ रही हैं।
उधर, कांग्रेस ब्लॉक कमेटी बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने के साथ गौला नदी पर तटबंध, आईटीसी नाले को भूमिगत करने और पेयजल के लिए ओवरहेड टैंक बनाने की मांग कर रही है।
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि अधिसूचना जारी होने तक धरना-प्रदर्शन और अनशन जारी रहेगा। उनका कहना है कि राजस्व गांव बनने से क्षेत्रवासियों की कई समस्याओं का समाधान होगा और सरकार को भी राजस्व संबंधी लाभ मिल सकेगा।
