निर्वाचन आयुक्त के घेराव में कांग्रेस का सैलाब देख घबराई भाजपा

हरीश रावत, गोदियाल समेत जुटे दिग्गज, क्या वाकई जनता का मिजाज बदल रहा है या सिर्फ मौसम की भीड़ है?

अमरनाथ सिंह
देहरादून। निर्वाचन आयुक्त के घेराव तथा धरना-प्रदर्शन में जिस तरह से कांग्रेस की भीड़ उमड़ी, उससे उत्तराखंड भाजपा घबड़ा गई है। भाजपा को यकीन नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भीड़ आएगी। केवल इतना नहीं, हरीश रावत, गणेश गोदियाल सहित सभी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शामिल हुए।

दोपहर 12 बजे निर्वाचन कार्यालय के बाहर का नजारा – 3 हजार से ज्यादा कार्यकर्ता, हाथ में तख्ती – “वोट चोरी नहीं चलेगी”, “SIR के नाम पर वोट काटना बंद करो”। पुलिस को बैरिकेड लगाना पड़ा। हरीश रावत 81 साल की उम्र में धरने पर बैठे, गोदियाल नारे लगा रहे थे, यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह सब एक मंच पर। भाजपा ने सोचा था 300-400 लोग आएंगे, फोटो खिंचवा कर चले जाएंगे। लेकिन सैलाब आ गया।

भाजपा की बेचैनी क्यों बढ़ी?

भाजपा के एक मंत्री ने नाम न छापने पर कहा – “हमें लगा कांग्रेस खत्म है, गुटबाजी में मरी है। लेकिन कल की भीड़ ने बेचैनी बढ़ा दी।”

कारण 3 हैं –

1. गुटबाजी खत्म, एकता दिखी: लंबे समय बाद हरीश रावत और प्रीतम सिंह एक साथ, गोदियाल और हरीश एक थाली में। भाजपा का प्लान था कि कांग्रेस में टिकट को लेकर सिर फुटौव्वल चल रहा है, भीड़ नहीं आएगी। लेकिन राहुल गांधी के “फील्ड वर्क” वाले संदेश के बाद सब फील्ड में आ गए।

2. मुद्दा जनता से जुड़ा: कांग्रेस वोट चोरी, SIR में नाम काटने का मुद्दा उठा रही है। पहाड़ में कई लोगों के नाम कटे हैं। भीड़ में 60% आम लोग थे, कार्यकर्ता नहीं। एक बुजुर्ग बोला – “मेरा नाम लिस्ट से कटा है, 40 साल से वोट दे रहा हूं।” यह भीड़ भाड़े की नहीं, गुस्से की थी।

3. भाजपा का बूथ कमजोर: भाजपा के प्रभारी दुष्यंत गौतम और अजेय कुमार के जाने से संगठन में शून्य है। महेंद्र भट्ट अध्यक्ष हैं पर बूथ नहीं संभाल पा रहे। कल जब कांग्रेस की भीड़ थी, भाजपा का एक भी कार्यकर्ता सड़क पर नहीं था। इसलिए भाजपा पशोपेश में है।

क्या वाकई भाजपाई कांग्रेस के धारदार आंदोलन से पशोपेश में हैं?

हां, हैं। क्योंकि पिछले 2 साल में कांग्रेस ने ऐसा धारदार आंदोलन नहीं किया। अंकिता भंडारी केस में भी 500 लोग आए थे, कल 3000 आए। भाजपा को लगा था कि आपदा, भू-कानून पर जनता चुप है, लेकिन निर्वाचन आयुक्त के घेराव ने दिखा दिया कि जनता सड़क पर आ सकती है।

भाजपा के एक विधायक ने कहा – “अगर कांग्रेस हर जिले में ऐसी भीड़ लाए तो 2027 में दिक्कत होगी। हमें भी बूथ पर जाना पड़ेगा।”

क्या वाकई जनता का मिजाज बदल रहा है या कांग्रेस नाटक कर रही है? या उमड़ी भीड़ मौसम की तरह है?

यह सवाल सबसे अहम है।

एक पक्ष कहता है – नाटक है, मौसम की भीड़ है। कांग्रेस ने बसों से भीड़ बुलाई, देहरादून के आसपास के कार्यकर्ता आए, पहाड़ से कोई नहीं आया। कल भीड़ आई, कल चली गई। जनता भाजपा के साथ है क्योंकि धामी का चेहरा अभी भी मजबूत है। वोट चोरी का मुद्दा उत्तराखंड में नहीं चलेगा, यहां पलायन, रोजगार मुद्दा है।

दूसरा पक्ष कहता है – नहीं, मिजाज बदल रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, आपदा में मुआवजा न मिलना, पटवारियों की हड़ताल – जनता में गुस्सा है। कांग्रेस ने उस गुस्से को जगह दी। हरीश रावत जैसे नेता के बैठने से बुजुर्ग जुड़ा, युवा जुड़ा। यह मौसम नहीं, मिजाज है।

सच बीच में है। भीड़ मौसम की तरह भी है और मिजाज की तरह भी। मौसम की तरह इसलिए कि कांग्रेस अगर हर हफ्ते ऐसा प्रदर्शन नहीं करेगी तो भीड़ फिर सो जाएगी। मिजाज की तरह इसलिए कि भाजपा अगर संगठन को नहीं संभालेगी, राम माधव भी कुछ नहीं कर पाएंगे।

निर्वाचन आयुक्त का घेराव एक ट्रेलर था। फिल्म 2027 में होगी। भाजपा घबराई है, यह सच है। लेकिन घबराहट से चुनाव नहीं जीते जाते, बूथ से जीते जाते हैं।

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